Search This Blog

Friday, 8 May 2020

Lockdown: निवाले को प्याले पर शिफ्ट करने के लिए खोले गए ठेके!

आंखों से न दिखने वाला छोटा सा वायरस पूरी दुनिया को दिन में तारे दिखा रहा है, इस वायरस के सामने दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत घुटने टेक चुकी हैं, पूरी दुनिया में अब तक करीब 276863 लोगों की जान कोरोना वायरस ले चुका है, जबकि 3937813 लोग इसकी चपेट में हैं, इसके अलावा बिना किसी ऊर्जा के ये दिन-रात सरपट दौड़ रहा है, इस वायरस ने दुनिया के ज्यादातर हिस्सों को खुली जेल बना दिया है, इसी वायरस ने न केवल पूरी दुनिया का गुरुर तोड़ा है, बल्कि विज्ञान और तकनीक के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

भारत में करीब 59662 लोग कोरोना वायरस की चपेट में हैं, जबकि 1981 मरीजों की जान जा चुकी है, हालांकि 130 करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान ने सतर्कता तो बरती, पर कुछ निजी स्वार्थ के चक्कर में इस वायरस को यहां फलने फूलने का मौका मिल गया क्योंकि सरकार कोरोना वायरस से निपटने के लिए उचित इंतजाम करने की बजाय वाहवाही लूटने में लगी और इसका ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने की सोचती रही और अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए इसकी टोपी उसके सिर उसकी टोपी इसके सिर पहनाती रह गई।

पहले तो सरकार विदेशों में फंसे भारतीयों को वापस ले आई और उनको मामूली चेकअप के बाद छोड़ दिया गया, जिसके चलते संक्रमण का प्रसार शुरू हुआ, इस बीच निजामुद्दीन मरकज में बड़ी संख्या में जमा जमातियों के संक्रमित होने और अन्य राज्यों में संक्रमण के संवाहक बनने की खबरें सुर्खियों में रही, यहां तक कि सरकार के हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में अलग से जमातियों का जिक्र किया जाने लगा, मीडिया भी कोराना से निपटने की तैयारियों पर चर्चा न करके जमातियों पर इस कदर टूट पड़ी, जैसे बारात में फेंके गए खाने पर कुत्ते टूट पड़ते हैं। शायद उनको लगता हो कि जमातियों के सिर पर कोरोना फैलाने का ठीकरा फोड़ देने से कोरोना डरकर भाग जाएगा।

इसके बाद सरकार मजदूरों को घर वापस लाने की तैयारी करने लगी, इसके लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें भी चलाई, जो ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुई, बल्कि मजदूरों के लिए और परेशानी ही बढ़ गई क्योंकि इतनी जटिल प्रक्रिया को पूरा करना अनपढ़ मजदूरों के लिए आसान नहीं है, जिसके चलते मजदूर हजारों मील पैदल साइकिल या ट्रेन की पटरी पर भी चलने से गुरेज नहीं कर रहे हैं, जिस ट्रेन पर मजदूरों को चढ़ने से सरकार ने रोक दिया, वही ट्रेन औरंगाबाद में मजदूरों के ऊपर से चढ़कर गुजर गई, जिसमें 16 मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई और ट्रैक पर छोड़ गए भूख की निशानी, खून लगी रोटी और खून के साथ बिखरी चटनी।

लॉकडाउन के करीब 40 दिन बाद सरकारें जागी और वादों की ट्रेनें-बसें मजदूरों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने के लिए दौड़ने लगी, पर शर्तें इतनी कठिन जोड़ दी गईं, जिससे पार पाना इनके लिए आसान नहीं था, इससे बचे तो किराये का इंतजाम करना भारी पड़ रहा था, लिहाजा सिर पर गरीबी की गठरी लिए भूख नंगे पांव दिन रात चलती जा रही है, न बदन पर पड़ती चिलचिलाती धूप उसका रास्ता रोक पा रही है, न हुक्मरान, न प्रशासन। भूख है तो सब्र कब तक करता और फिर मौत से वो डरे भी क्यों? मरना तो उसे है ही वजह चाहे भूख हो या कोरोना वायरस, उसे क्या फर्क पड़ता है।

ऐसा लगता है सरकार इस मामले में कोई भी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहती है, 40 दिन बाद सरकार सोच पाई कि मजदूरों को उनके घर वापस भेजना चाहिए, रोटी के लिए मजदूर आए दिन सड़क पर संग्राम कर रहे थे, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ने की आशंका थी। अब सरकार आर्थिक नुकसान का हवाला देकर शराब के ठेके खुलवा दी, इससे एक तो मोटा राजस्व आएगा, दूसरे ट्रोलर इस बात को प्रचारित करेंगे कि शराब के लिए पैसे हैं तो रोटी के लिए क्यों नहीं, जैसा कि अभी हो भी रह है। इससे सरकारों की जिम्मेदारी पर उठने वाले सवाल हल्के हो जाएंगे और सरकार आसानी से निवाले को प्याले पर शिफ्ट कर सकती है।

क्या सरकार को ये नहीं पता था कि लॉकडाउन इतना लंबा खिंचने वाला है, इसके बावजूद सरकार मजदूरों को आश्वासन का घूंट देकर रोके रखी, सरकारी इंतजाम भी किए गए, पर को नाकाफी साबित हो रहे थे, जबकि चाहिए ये था कि धीरे-धीरे सरकार मजदूरों को उनके घर वापस पहुंचा देती, लेकिन सरकार को डर था कि मजदूर एक बार घर चले गए तो वापस नहीं आएंगे, इसलिए भी मजदूर जहां थे, वहीं पर रोके रखा गया, लेकिन मजदूरों का सब्र तब जवाब देने लगा, जब लॉकडाउन में फंसे नवाबजादों को सरकारें निकालने लगी, तब मजदूरों के बागी तेवर सरकारों को परेशान करने लगी और मजबूरन उन्हें घर भेजने का इंतजाम करना पड़ रहा है, पर ये इंतजाम भी हाथी का दांत साबित हो रहा है।

Thursday, 7 May 2020

LG Polimers: स्टाइरिन गैस लीक ने 35 साल पुराना जख्म हरा कर दिया

विशाापट्टनम में एक बार फिर गैस रिसाव की घटना सामने आई है, लीकेज दोबारा उसी जगह पर हुआ है, जहां गुरूवार तड़के हुआ था, मौके पर एनडीआरएफ की टीम मौजूद है, 50 दमकलकर्मियों के अलावा एंबुलेंस भी तैयार हैं, फॉम टेंडर को भी बुलाया गया है, कई किमी तक गांवों को खाली करा दिया गया है और रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है।
समुद्र तट पर बसे आंध्र प्रदेश के सबसे खूबसूरत शहर विशाखापट्टनम में 6-7 मई की रात 2.30 बजे विजाग स्थित एलजी पॉलिमर्स इंडिया की यूनिट से स्टाइरिन गैस रिसने लगी, जो गहरी नींद में सो रहे लोगों को सीधा मौत के मुंह में ले जाने लगी, पर मौत बांटती गैस के बारे में जानते जानते सुबह हो गई और सूरज की किरणों के साथ ही बेसुध लोग सड़कों पर बिछने लगे, आनन फानन में प्रशासन ने बचाव कार्य शुरू किया। फिर भी 13 जिंदगियां मौत की आगोश में समा गई हैं और 300 लोग जिंदगी के लिए जंग लड़ रहे हैं।
कोरोना वायरस की चेन तोड़ने के लिए लॉकडाउन किया गया, पर इस लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था पर कभी न खुलने वाला ताला जड़ जाने की आशंका के चलते लॉकडाउन 3 को कुछ शर्तों के साथ छूट दी गई, ताकि ठप पड़ती अर्थव्यवस्था को जिंदा रखा जा सके, इसके बाद ही इस यूनिट को भी चालू किया गया, पर यूनिट के चालू होते ही गैस रिसाव ने ये साबित कर दिया है कि पिछली घटना से  हमने सबक नहीं लिया, इस घटना ने एक बार फिर 35 साल पुराने जख्म को हरा कर दिया है, जब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल कब्रिस्तान में तब्दील हो गई थी, 2-3 दिसंबर 1984  की दरम्यानी रात जब पूरा शहर गहरी नींद में सो रहा था, तभी यूनियन कार्बाइड की फ़र्टिलाइज़र फैक्ट्री से मिथाइल आइसोनाइट गैस का रिसाव हुआ और लाशों के ढेर लग गए, जो लोग बचे भी वो आज तक तिल तिल कर मर रहे हैं।
हालांकि विशाखापट्टनम में हुए इस हादसे को समय रहते नियंत्रित कर लिया गया है, प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री और मुख्यमंत्री तक इस घटना की पल पल की अपडेट लेते रहे, राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को एक एक करोड़ रूपए मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को उसी कंपनी की किसी यूनिट में नौकरी दिलाने का वादा किया है। एलजी पॉलिमर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना 1961 में हिंदुस्तान पॉलीमर्स ने किया था, जिसका 1997 में दक्षिण कोरियाई कंपनी एलजी ने अधिग्रहण कर लिया था।
हाईकोर्ट ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है कि केमिकल फैक्ट्री को रिहायशी इलाकों में किस नियम के तहत स्थापित करने की मंजूरी दी गई है, जबकि जोखिम वाली यूनिट को हमेशा शहर के बाहर लगाया जाता है, ताकि ऐसी स्थिति में कम से कम जनहानि हो।
स्टाइरिन गैस मूल रूप में पोलिस्टाइरिन प्लास्टिक और रेजिन बनाने में इस्तेमाल होती है यह रंगहीन या हल्का पीला ज्वलनशील लिक्विड होता है, इसकी गंध मीठी होती है, इसे स्टाइरोल और विनाइल बेंजीन की कहा जाता है, बेंजीन और एथिलीन के जरिए इसका औद्योगिक मात्रा में बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है, स्टाइरिन का इस्तेमाल प्लास्टिक और रबर बनाने में किया जाता है।
स्टाइरिस अगर हवा में मिल जाए तो यह नाक और गले में जलन पैदा करती है, इससे खांसी और गले में तकलीफ होती है साथ ही फेफड़े में पानी भरने लगता है, अगर स्टाइरिन ज्यादा मात्रा में सांस के जरिए शरीर में पहुंचती है तो यह स्टाइरिन बीमारी को जन्म से सकती है, इसमें सिर दर्द जी मिचलाना थकान सिर चकराना कन्फ्यूजन और पेट में गड़बड़ी जैसी दिक्कतें होने लगती हैं, इसे सेंट्रल नर्वस सिस्टम डिप्रेशन कहा जाता है, कुछ मामलों में इस गैस के संपर्क में आने से दिल की धड़कन असामान्य होने और कोमा जैसी स्थिति तक बन सकती है।
महामारी विज्ञान में कई अध्ययनों से ये पता चला है कि स्टाइरिस के संपर्क में आने से ल्युकेमिया या लिंफोमा का भी खतरा बढ़ सकता है, पर इसे अभी पुख्ता तौर पर साबित नहीं किया जा सका है, जबकि इस गैस का असर लंबे समय तक नहीं रहता है कुछ विशेषज्ञ इस बात का भी दावा करते हैं, पर  कुछ लोग इस गैस से कैंसर फैलने का खतरा भी बताते हैं, ये गैस ऑक्सीजन के साथ रिएक्शन कर स्टाइरिन डाइऑक्साइड बनाती है, जो बहुत जानलेवा होती है, इस गैस के खतरे को देखते हुए इसे हैजार्ड्स एंड टॉक्सिक केमिकल के दर्जे में रखा गया है।

Sunday, 23 June 2019

जिसे हम तरक्की समझते हैं वही असल गुलामी-लाचारी

सुबह नींद खुलते ही मोबाइल उठाया और निर्जीव खिलौने के साथ खेलने लगा, सोचा अभी चार्ज में लगाएगा, पर जैसे ही चार्जिंग पॉइंट से मोबाइल को कनेक्ट किया, बत्ती गुल हो गयी. जब तक मोबाइल चला, तब तक उससे खेलता रहा, लेकिन जैसे ही वह खिलौना शांत हुआ, वह बेचैन हो उठा, बिजली का इंतजार करने लगा और बिजली विभाग को कोसने लगा. बेचैनी में वह हॉल से कमरे में और कमरे से हॉल में फिर हॉल से बाहर गैलरी में चक्कर काटता रहा क्योंकि ऑफिस जाने का समय भी हो रहा था, लेकिन समय का सही अंदाजा उसे नहीं लग पा रहा था.

बिजली आने के इंतजार में वह पड़ा रहा, थोड़ी देर बाद बाहर निकला, इस उम्मीद में कि शायद कोई मिल जाये, जिससे वह समय पूछ ले. पहली बार उसे लगा कि तकनीक ने उसे किस कदर अपाहिज बना दिया है. एक समय था जब न घड़ी की जरूरत थी, न मोबाइल की क्योंकि तब सूरज की रोशनी से पड़ती परछाईं देखकर अंदाजा लग जाता था कि कितना समय हो रहा होगा, लेकिन बढ़ती तकनीक ने पुराने नुस्खों को पुराना कर दिया और उसकी जगह नई तकनीक ने ले ली. इंसान जितनी चाहे तरक्की कर ले, लेकिन प्रकृति की बनाई चीजों का मुकाबला नहीं कर सकती.

तकनीक ने चीजों को जितना आसान किया है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किलें खड़ी कर दी है, जिस इंटरनेट को दुनिया तरक्की का पैमाना मान रही है, उसने कामयाबी तो दिलाई, लेकिन युवा पीढ़ी को पूरी तरह बर्बाद कर गयी है. आज की पीढ़ी के सबसे करीब इंटरनेट युक्त मोबाइल है. नींद की गहरी झपकी आने तक और नींद खुलने के तुरंत बाद सबसे पहले मोबाइल पर हाथ जाता है, कई बार तो इंसान नींद में भी मोबाइल को ही टटोलता रहता है. देश के जाने माने उद्योगपति दिवंगत धीरू भाई अंबानी ने हर हाथ मोबाइल पहुंचाने का सपना देखा था, जिसे उन्होंने पूरा भी किया, लेकिन उनके बेटे मुकेश अंबानी ने तो जियो देकर जैसे युवा पीढ़ी को चरस का नशा ही दे दिया है.

बूढ़े, जवान, महिला, पुरुष के अलावा छोटे बच्चे भी मोबाइल के आदी होते जा रहे हैं, जो बच्चा एक साल का है, वह भी मोबाइल पाकर चुप हो जाता है, या तो मोबाइल में चलते चित्र या उससे निकलती ध्वनि को सुनकर वह खुश हो जाता है. कई बार तो बच्चे मोबाइल के बिना चुप ही नहीं होते. इस तकनीक का युवा पीढ़ी पर कितना बुरा असर पड़ रहा है, इसका अंदाजा भले ही अभी किसी को नहीं लग रहा, लेकिन आने वाली पीढ़ी मोबाइल-इंटरनेट की एडिक्ट होकर ही पैदा होगी.

अब बच्चों में खेलकूद से इतर वीडियो गेम और मोबाइल गेम का चस्का लगता जा रहा है और तकनीक उनके लिए लुभावना बाजार भी तैयार कर रहा है. किसी भी शहर के किसी भी मॉल में आप चले जाइये, आपके बच्चों को लुभाते बाजार नजर आ जायेंगे और आपको न चाहते हुए भी अपने बच्चों के लिए ऐसी बाजार का भोगी बनना पड़ेगा. बचपन में खेलकूद से शरीर चुस्त-फुर्त रहता था, पर अब तकनीक ने हर किसी को इस कदर आलसी बना दिया है कि कोई भी एक झटके से टूट सकता है.

इसी बाजारवाद के चलते आत्महत्या के मामले भी बढ़ रहे हैं. अब न तो वो आत्मविश्वास है और न ही वो मजबूती, जो विषम परिस्थितियों में भी खुद को खड़ा रखने की ताकत देती थी, रही सही कसर बाजार पूरी कर दे रहा है, कई बार मन माफिक चीजें नहीं मिलने या दोस्तों से बराबरी करने के चक्कर में ऐसे कदम उठाने की बात सामने आती रहती है. कुल मिलाकर तकनीक ने चीजों को जितना आसान किया है, इंसान को उतना ही कमजोर, बेबस और लाचार बना दिया है, यही वजह है कि जिसे हम तरक्की समझ बैठे हैं, वही असल में गुलामी है. इसी बाजारवाद ने पूरी दुनिया को गुलाम बना लिया है.

Sunday, 16 June 2019

पितृ दिवस: दिखावा नहीं मां-बाप को बच्चों का असली प्यार चाहिए

बढ़ती तकनीक के साथ साथ इंसान भी कितना तकनीकी होता जा रहा है, जो हर स्थिति-परिस्थिति को दिखावटी-बनावटी रूप में पेश करता है। हर त्योहार के महत्व को कुछ शब्दों के संदेश में समेटता जा रहा है, जबकि संदेश का हर एक शब्द भावना विहीन होता जा रहा है, आधुनिक होती दुनिया की यही सच्चाई है। वरना हजारों हजार मित्र सोशल मीडिया पर होने के बावजूद इंसान तन्हा नहीं होता। घर में जीवित लोगों के बीच बैठकर निर्जीव खिलौने से खेल न रहा होता।

इसके पीछे दिखावे की प्रवृत्ति हावी होती मालूम पड़ती है क्योंकि आधुनिकता के दौर में हर कोई आगे निकलने की होड़ में है, एक दौर था, जब हर एक त्योहार पर अपने से बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद लेते थे, आज की पीढ़ी को तो जैसे पैर छूने में शर्म ही आती है, कभी हिम्मत जुटाकर या डर से किसी का पैर छूना भी पड़े तो उसके पहले अगडे़-पिछड़े और ऊंच-नीच का खयाल मन में आता है, जबकि आप जिस किसी का भी पैर छुएंगे, उसके दिल से आपके लिए दुआ ही निकलेगी, भले ही आपसे उसकी दुश्मनी ही क्यों न हो.

आजकल सभी त्योहारों का महत्व एक संदेश से अधिक कुछ नहीं रह गया है. शुभकामना संदेश भेजकर हम भी अपने कर्तव्यों से मुक्त हो जाते हैं. हमे याद है 2013 की बात है, दीपावली के मौके पर हमने भी मेल पर गिरीश उपाध्याय सर को शुभकामना संदेश भेजा था, तब संदेश के बाद हमने लिखा था कि सर हमे नहीं मालूम कि ये शुभकामनाएं देना कितना सही है क्योंकि आधुनिकता हमारे अधिकारों का क्षरण करती जा रही है. अब तो किसी त्योहार के मौके पर भी किसी बड़े का पैर छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा खत्म होती जा रही है, एक दौर था जब त्योहारों के बहाने बड़ों का आशीर्वाद लेने का मौका मिलता था, होली के दिन का खासतौर पर इंतजार रहता था, दो-चार साल में कभी एक बार होली घर पर मनाने का मौका मिलता था, उस दिन जो भी अपने से बड़ा मिला, भले ही वह नीची जाति का क्यों न हो, उसका पैर छूकर आशीर्वाद जरूर लिया. अब वह मौका भी हाथ से निकल चुका है. 

फादर्स-डे पर सोशल मीडिया पर जितना प्यार उमड़ रहा है, यदि ये हकीकत होता तो पूरे देश में वृद्धाश्रमों की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन दुर्भाग्य है कि जितने मां-बाप अपने घरों में रहते हैं, उतने ही वृद्ध आश्रमों में रहने को मजबूर हैं क्योंकि जिन अनपढ़ मां-बाप की परवरिश के बलबूते बेटा अफसर बनता है, उसके बाद उसी मां-बाप को बात-बात पर वह पिछड़ा और फिजूल साबित करने पर लगा रहता है. भले ही मां-बाप अपने चार-छह बच्चों को पढ़ा लिखाकर काबिल बना देते हैं, लेकिन वही चार-छह बच्चे मिलकर मां-बाप का पेट नहीं भर पाते।

चार अक्षर अंग्रेजी बोलकर और छोटे कपड़े पहनकर हम खुद के आधुनिक होने का मुगालता पाल बैठे हैं, जबकि ये कपड़ों के साथ छोटी होती हमारी सोच की तस्दीक है. जब तुम दुनिया में आये थे, तब पहली बार उसी अनपढ़ में मां ने तुम्हे सबकुछ सिखाया था, जिन कंधों को तुमने बेसहारा छोड़ दिया, वही कंधे जब तुम नहीं चलते थे, या चलकर थक जाते थे, तब तुम्हारा भार उठाते थे।

Tuesday, 11 June 2019

एक शब्द भी अपने खिलाफ नहीं सुनने वाली बीजेपी इस पोस्टर पर अवार्ड देगी?

एक शब्द भी अपने खिलाफ बर्दाश्त नहीं कर पाने वाली बीजेपी इस पोस्टर पर अवार्ड देगी? किसी के दावे को दिखाने-बताने पर पत्रकारों को हथकड़ी लगवाने वाली बीजेपी एक महिला मुख्यमंत्री की गरिमा भंग करने पर कार्रवाई करेगी? महिला मुख्यमंत्री हो या साधारण नागरिक, इस तरह दबोचना और उसे प्रचारित करना महिला जाति का महिमामंडन है? समाज के ऐसे 'जानवरों' को जेल में जगह नहीं मिलने पर जंगल में छोड़ देना चाहिए?

जिस बात पर पत्रकारों की गिरफ्तारी की गयी है, उसमें किसी ने अपनी तरफ से कुछ जोड़ा नहीं है, बल्कि उस महिला की बात को ही आगे बढ़ाया है. महिला ने कथित तौर पर खुद को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रेम संबंध होने का दावा किया था, साथ ही ये भी कहा था कि पिछले एक साल से वह वीडियो कॉलिंग के जरिये योगीजी से बात कर रही है, लेकिन अब वह उनसे मिलकर अपनी बात कहना चाह रही थी, जिसके लिए उसने सीएम से मिलने की अनुमति भी मांगी थी.


हालांकि, योगीजी के चरित्र पर किसी को संदेह नहीं हो सकता है, लेकिन महिला किन परिस्थितियों में मीडिया के सामने आयी, क्या उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, या किसी के उकसावे या बहकावे में आकर उसने ऐसा किया, इस बात की जांच करने की बजाय उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस उस वीडियो को शेयर करने वालों पर शिकंजा कसने लगी, जबकि योगीजी को भी इस साजिश की जांच करानी चाहिए कि कहीं उनके अपने ही तो नहीं उनकी पीठ में छुरा घोंपने में लगे हैं.

ये कोई नई बात नहीं है, ऐसे आरोपों से कम लोग ही बच पाते हैं, कुछ समय पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर भी एक महिला ने आरोप लगाया था कि राहुल ने उससे शादी करने का आश्वासन दिया था और वह उनसे शादी करके घर बसाना चाहती थी, राहुल गांधी के बच्चे की मां बनना चाहती थी, ये खबर मीडिया की सुर्खियां बनीं, सोशल मीडिया को तो मानो खजाना ही मिल गया था, लेकिन इस खबर पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की निजी तस्वीरें किसने शेयर की, पर इन सबसे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सत्ता के आगे किसी का आत्मसम्मान मायने नहीं रखता।

कहते हैं जाकी पांव न फटी बिवाई सो का जाने पीर पराई। सोनिया गांधी को बार डांसर, मायावती को वैश्या, नेहरू को अय्याश, गांधी को देशद्रोही बताने वाले कौन लोग हैं, क्या सरकार को ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए, या शासन को अपने अलावा और किसी के आत्म सम्मान की चिंता नहीं है। यदि पहले ऐसे आरोपों पर कार्रवाई हुई होती तो आज कोई भी इस वीडियो को शेयर करने की हिम्मत नहीं करता. पर ऐसा संभव इसलिए नहीं था क्योंकि ये लोग सत्ता में नहीं थे, अभी हाल ही में बीजेपी की महिला कार्यकर्ता ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मीम शेयर किया था, जिसके चलते उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था. तब कौन चिल्ला रहा था।


योगी के चरित्र पर किसी को शक नहीं है और होना भी नहीं चाहिए, लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह के खुलासे हुए हैं, उससे किसी बात को कोई आसानी से गले नहीं उतार सकता. चाहे आसाराम हों, या उनके बेटे नारायण साईं, राम रहीम हों या रामपाल, सिर्फ इनके नाम का जिक्र करने भर की देरी है, इसके बाद हर किसी के जेहन में इनके कारनामों का काला चिट्ठा हवा में तैरने लगेगा, सत्ता में रहने पर सबने इस तरह की पाबंदी लगाई और विपक्ष में रहने वाला ऐसी कार्रवाई को तानाशाही और आवाम की आवाज दबाने वाली कार्रवाई बताता है, जबकि सत्ता में आने के बाद वह भी वही करता है. यूपीए की सरकार में भी नेहरू का कार्टून बनाने के चलते असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार किया गया था।


कई बार ऐसा लगता है कि धर्म की आड़ में अधर्म का ही व्यापार चल रहा है, मंदिर-मस्जिद, चर्च जैसी धार्मिक इमारतें अधर्म का अड्डा बन गयी हैं और उनके संरक्षक पंडित, मौलवी, पादरी बन गये हैं, जिनके संरक्षण में ये व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है और हर मुद्दे को धर्म का चोला ओढ़ा दिया जा रहा है। पिछले कुछ सालों से ऐसा ही हो रहा है, हर जख्म पर धर्म का रंग चढ़ाया जा रहा है, हर घटना को हिन्दू-मुसलमान बनाया जा रहा है. बस मानवता का रंग छोड़कर बाकी हर रंग समाज में  बहुतायत में उपलब्ध है।

Sunday, 9 June 2019

पहली ही मुलाकात में बना दिया कर्जदार?

वह शाम भी कितनी हसीन थी, मैं भी बहुत उत्साहित था क्योंकि एक दोस्त से मुलाकात जो होनी थी। घड़ी पर बार-बार नजरें टिकती और मैं जल्दी-जल्दी समय बीतने का इंतजार करता, पर समय तो जैसे बीत ही नहीं रहा था। हालांकि, कुछ देर बाद इंतजार खत्म हुआ और दोस्त से मुलाकात हुई, करीब 1.30 घंटे बाद जब वापस जाने लगा, तभी एक लड़की को फोन किया, जिससे कुछ दिन पहले ही मुलाकात हुई थी, शाम का वक्त था, लिहाजा वह भी अपने घर पर थी, पर दर्द से कराह रही थी, इस वजह से सोचा मिलता चलूं, जबकि वह खाना बनाना तो दूर किचन तक जा भी नहीं सकती थी, पर किसी के आ जाने की आहट मिलते ही वह उठकर बैठ गयी और अगले ही पल उसका आलस खर्राटे भरने लगा और वह सीधा किचन में जाकर कुछ पकाने लगी, अमूमन ऐसा सिर्फ मां ही कर सकती है क्योंकि बच्चों का पेट भरे बिना मां का पेट कभी भरता नहीं, मां जब तक अपने बच्चे को अपने सीने से नहीं लगाती, तब तक वह उसे सुरक्षित महसूस नहीं करती और बच्चे को भी मां का वो आंचल पूरे ब्रह्माण्ड से प्यारा लगता है। हालांकि, जितनी देर तक वह खाना बनाती रही, उतनी देर तक वह उसी के आसपास टहलता रहा क्योंकि वहां बैठने की कोई जगह नहीं थी, जो जगह थी, वहां बैठना मुश्किल था क्योंकि टाइट कपड़ों से कसे बदन में जमीन पर बैठना एवरेस्ट फतह करने से कम नहीं था।

इसी वजह से वह उससे बातें करता रहा और वह खाना बनाती रही, करीब 45 मिनट बाद खाना बनकर तैयार हो गया, तभी उसने उससे कहा कि खाना खा लो, पर वह उसके साथ कुछ और समय बिताना चाहता था, इस वजह से भोजन में देरी कर रहा था, जबकि समय के साथ-साथ आशंकाएं भी बढ़ती जा रही थी कि अकेली लड़की की मौजूदगी में घर में किसी अनजान लड़के को देखकर लोग न जाने क्या-क्या सोच बैठेंगे। इस वजह से जल्दी ही खाना खा लिया। अब उससे विदा लेने की बारी थी, पर वह जाना नहीं चाहता था, वह बार-बार रुकने की कोशिश कर रहा था क्योंकि वह उसके चेहरे को पढ़ना चाहता था, जो दर्द उसके चेहरे पर साफ तौर पर झलक रहा था, लेकिन उसको नहीं पता था कि वह उसके चेहरे का दर्द पढ़ रहा है, बार-बार वह उसको पुराने खयालों में ले जाता ताकि वो अपना दर्द उससे बांट ले, पर वो तो ममता और समर्पण की मूरत थी।

जिसे देखकर उसका दर्द आदि सब गायब हुआ था, वो उसका बहुत करीबी भी नहीं था, बस एक साधारण सी मुलाकात हुई थी, जिसमें थोड़ी-बहुत बातचीत हुई थी, जिससे एक बात तय हो गयी थी कि दोनों एक ही परिस्थिति के मारे थे, दोनों का दर्द कमोबेश एक जैसा ही था, यही वजह थी कि दोनों कम समय में ही एक दूसरे के करीब आ गये, फिर भी जितनी दूरी बची थी वो किसी खाईं से कम नहीं थी क्योंकि दोनों का दर्द एक होने का ये मतलब नहीं कि आप बिना आधार के कुछ भी अनुमान लगाने लगें। दर्द एक सा होने के बावजूद दोनों की सोच बिल्कुल अलग थी, वह असमंजस में थी कुछ कह नहीं पाती थी इस डर से कि मैंने अपनी परेशानियों का जिक्र तो कर दिया, जिसके चलते मुझे डूबते वक्त एक तिनका मिला है, उसी के सहारे मैं खुद को डूबने से बचा सकती हूं, पर मेरे दिल-दिमाग की स्थिति महासागर से उठती गिरती ऊंची-ऊंची लहरों जैसी हो रही है, यदि उसका जिक्र गलती से भी मेरी जुबां पर आया तो ये सहारा भी मुझसे छिन जायेगा। बस यही बात समझने की वह कोशिश करता रहा और वह छिपाने की। करीब एक घंटे की मुलाकात में दोनों कुछ न कुछ छिपाते रहे, लेकिन वह तो उतनी देर में उसके मन की बात पढ़ लिया। जिसे वह उससे छुपा रही थी।

उससे विदा लेने के बाद वह और ज्यादा बेचैन हो उठा क्योंकि उस वक्त तक वह उसके दिल-दिमाग को पढ़ लिया था, फिर खुद को वह मजबूत किया और सोशल मीडिया के जरिए उसको संदेश भेजा कि मैंने तुम्हारे चेहरे का दर्द पढ़ लिया है और तुम्हारे दिल-दिमाग में चल रही हर उलझन को भी समझने का प्रयास किया। जहां तक मैं समझ पाया हूं कि तुम मजबूरीवश मेरी हां में हां मिलाती हो, पर हकीकत तो ये है कि साथ छोड़ना भी नहीं चाहती। तुम्हारे मन में जो कुछ भी हो, बेझिझक कह सकती हो, मैं तुम्हारा दोस्त हूं, कोई किराये का हमदर्द नहीं। तुम्हारी खुशियों के लिए मैं अपनी खुशियां कुर्बान करने को तैयार हूं, बस एक बार कहकर तो देखो, तुम्हारी हर खुशी के लिए मैं पूरी जान लगा दूंगा। तुम किसी और को चाहो, किसी से भी दोस्ती करो, उसके लिए भी मैं तुम्हे कभी नहीं रोकूंगा। पर इसके साथ ही उसके मन-मस्तिष्क में एक बात और गूंज रही थी कि आखिर उस रोटी का कर्ज भी तो चुकाना पड़ेगा, जिसे वह सिर्फ उसके लिए बनाई थी, वो भी उस हाल में जब वह खुद अपने लिए नहीं बना सकी थी, उसके इसी बेबाक और निःस्वार्थ समर्पण ने उसका दिल जीत लिया और उसे उसका कर्जदार भी बना दिया।

उस कर्ज के चलते उसके कदम भी थमने लगे थे, वह तो महज इत्तेफाक था जो वह उसके पास चला गया था क्योंकि वह भी शाम के वक्त उसी के घर के करीब से एक दोस्त से मिलकर लौट रहा था, वहां से जब वह खाली हुआ तो काफी वक्त हो चुका था, फिर भी वह उसे फोन किया, तब पता चला कि वह घर पर तो है, पर सो रही है, क्योंकि उसे तबीयत कुछ नासाज लग रही थी, तभी वह उससे कहा कि ठीक है तुम आराम करो, वो तो मैं इधर से गुजर रहा था, इस वजह से फोन कर लिया, तभी उसने कहा कि नहीं...नहीं...आ जाओ मैं कमरे पर ही हूं, पर मैने कहा कि मैं अभी खाना भी नहीं खाया हूं, तो उसने जवाब दिया कि आ जाओ मैं आपको खाना खिलाती हूं, पर मैंने पूछा कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है तो खाना कैसे बनाओगी तो उसने कहा कि तुम तो बस आ जाओ मैं फटाफट खाना तैयार कर दूंगी। फिर मुझे लगा कि वह इतने प्यार से बुला रही है तो जाना चाहिए और मैं उसके पास गया तो दरवाजा नोक किया, दूसरी बार नोक किया तो वह दरवाजा खोलते हुए मुझे अंदर आने का इशारा की और मैं कमरे में दाखिल हुआ, फिर अगले ही पल गप्पेबाजी शुरू।

ये महज इत्तेफाक ही था कि मैं चला था दोस्त के घर से अपने घर, पर पहुंच गया उसके पास, 10 अप्रैल 2018 को लिखी इस कहानी पर अचानक नजर पड़ी तो सोचा इसे ब्लॉग पर ही डाल दूं. कम से कम इसी बहाने वह कभी कभार याद आती रहेगी और कर्जदार होना और उसे चुकाना भी याद रहेगा क्योंकि कर्ज फर्ज मर्ज कभी भूलना नहीं चाहिए।

Thursday, 16 May 2019

दरबारी प्रथा के स्वर्णिम युग में पत्रकारिता

इतिहास-भूगोल में एक मामूली सा अंतर होता है, लेकिन ये अंतर नदी के दो किनारों की तरह होता है, जो साथ चलकर भी कभी एक नहीं हो पाता. तारीख पर दर्ज एक-एक शब्द आने वाली पीढ़ियों को अतीत की सैर कराती हैं. उन्हें पुरानी नीतियों-रीतियों-परंपराओं से रुबरू कराती हैं. पर दरबारी प्रवृत्ति उन शब्दों पर चाटुकारिता का जो मसाला लगाती हैं, उससे तारीख का पूरा जायका ही खराब हो जाता है. दौर कोई भी रहा हो, राजशाही, मुगलशाही, राजपूतशाही या लोकतांत्रिक शासन प्रणाली. कभी दरबारियों की कमी नहीं रही, इन्हीं दरबारियों ने लोगों को इस कदर गुमराह किया है कि सही जानकारी न दर्ज कर उस दौर की शासन पद्धति के गुणगान में ही पूरा तारीख भर डाले.

जितनी बार तारीख का पन्ना पलटते हैं, उतनी बार अलग-अलग जानकारी मिलती है, या यूं कहें कि अपभ्रंश या विरोधाभाष देखने को मिलता है, जिससे पाठक गुमराह हो जाता है कि वह क्या सही माने और क्या गलत समझे. मसलन एक इतिहासकार अमुक बात लिखता है तो दूसरा उसका विरोध करता है, दूसरा जो लिखता है, उससे पहला इत्तेफाक नहीं रखता. यहीं से नई विचारधारा का जन्म होता है, और यही इतिहास पाठकों को विचारधाराओं के नाम पर खेमों में बांट देती है.

ऐसा ही मौजूदा सियासी दौर में भी चल रहा है. सब के सब संविधान और लोकतंत्र बचाने की दुहाई दे रहे हैं, जबकि वास्तविकता ये है कि किसी को संविधान या लोकतंत्र की चिंता नहीं है, बल्कि अपनी व पार्टी की चिंता सता रही है. इसके लिए रोजाना मर्यादा की आबरू उसे बचाने वाले ही लूट रहे हैं. इस काम में कोई पीछे नहीं है, एक सेर है तो दूसरा सवा सेर बनने की कोशिश कर रहा है. एक से बढ़कर एक बड़बोले सामने आ रहे हैं और वोट के लिए खून-खराबा करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं.

17वीं लोकसभा के लिए होने वाला आम चुनाव अंतिम दौर में है, नेता गिरगिट की तरह रंग बदलकर जनता के सामने वोट के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं और खुद को समाज का दर्पण बताने वाली मीडिया गिरगिट के रंग को भी अपने हिसाब से बदलकर प्रचारित कर रही है. पिछले कुछ दिनों में कई नामी पत्रकारों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार किया है. जिसकी पारदर्शिता-विश्वसनीयता पर सवाल उठे नहीं, बल्कि सवाल बरसे हैं. ज्यादातर साक्षात्कार में जवाब देने वाले के चेहरे पर तनाव दिखता है, और वो भी जब पांच साल के शासन का हिसाब देना हो तो चेहरे पर सिकन स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी साक्षात्कार में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा.

इन साक्षात्कारों में बड़े-बड़े पत्रकारों ने सवालों के स्तर को इतना गिरा दिया है, जितना कोई इंसान चाहकर भी नहीं गिर सकता. नरेंद्र मोदी के आम खाने से लेकर पर्स रखने, रोटी बेलने तक की बात पूछ लिये, बस अंडरवियर की बात पूछना भूल गये और ये पूछना भी भूल गये कि कितनी बार क्या-क्या खाते हैं और कितनी बार में कितना-कितना निकालते हैं. बस यूं ही मन में आ गया तो सोचा कि याद दिला दूं, शायद किसी बड़े पत्रकार की नजर इस लेख पर पड़ जाये और उसे जब भी प्रधानमंत्री से सवाल करने का मौका मिले तो वह इस सवाल को शामिल कर लेगा तो हम भी धन्य हो जाएंगे, भले ही बड़ा पत्रकार न बन पाएं, लेकिन बुढ़ापे में बच्चों को किस्से-कहानियां सुनाते समय 56 इंची सीना फुलाकर बता तो पाएंगे कि अमुक सवाल फलां पत्रकार को पूछने की सलाह हमने ही दी थी.

जब अगली पीढ़ियां अतीत के पन्ने पलटेंगी, या लाइब्रेरी में पुराने साक्षात्कार खंगालेंगी और संयोग से दो चार दिन के अंतराल में पक्ष-विपक्ष का साक्षात्कार देखेंगी तो तस्वीर साफ हो जायेगी कि उस दौर में भी पत्रकारिता किस कदर सत्ता के चरणों में पड़ी थी. उस वक्त जब युवा पीढ़ियां आपसे सवाल करेंगी तो आपके पास खुद से नजर मिलाने की भी ताकत नहीं होगी, फिर उन युवाओं का सामना करना कितना मुश्किल होगा, इसके बारे में आप भी सोचिए क्योंकि जो सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए, वो विपक्ष से पूछा जा रहा है और सरकार के खान-पान, मौज-मस्ती की बातें पूछी जा रही हैं.

चुनाव का क्या है ये तो आते-जाते रहेंगे, पांच साल में 25 दिन जनता के सामने गिड़गिड़ाने वाले बरसाती मेढक सियासी बारिश खत्म होते ही लापता हो जाएंगे, जब कभी उनका जनता से सामना हो भी जाता है तो वह गिरगिट जैसे रंग बदल लेते हैं, यानि 30 दिन चरण वंदन करने वाला नेता जनता से 330 दिन तक चरणवंदन करवाना चाहता है, लेकिन तारीख पर दर्ज दस्तावेज को कैसे मिटाएंगे. अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिये कि क्या आपने जो किया वह सही है, अभी भी वक्त है, नहीं सुधरे तो बुढ़ापे में पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं बचेगा और खुद के खोदे गड्ढे में अपनी अगली पीढ़ी को दफन होते देखकर कैसा लगेगा.