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Tuesday, 2 October 2018

MP: एक परिवार-दो दावेदार, विधानसभा चुनाव में उतरेंगे कई नामदार

भोपाल। मध्यप्रदेश में बीजेपी के लिए जीत की राह आसान नहीं है. जीत का चौका लगाने के लिए बेताब बीजेपी उसी चाल में फंसती नजर आ रही है, जिसके सहारे वह अब तक विरोधियों को जाल में फंसाती थी, ऐसा इसलिये कि इस बार चुनाव में 'एक परिवार दो दावेदार' की कतार लंबी है. जिससे निपटना बीजेपी के लिये किसी खास रणनीति से कम नहीं है.

दरअसल, आगामी विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश बीजेपी में वशंवाद की नई खैप तैयार हो गई है, जो इस बार चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है. वंशवाद की राजनीति का हमेंशा विरोध करने वाली बीजेपी इस बार खुद वंशवाद के आरोपों से घिरती दिखाई दे रही हैं. ऐसा इसलिये कि इस बार दस से ज्यादा नेताओं के पुत्रों ने चुनाव में उतरने की तैयारी कर ली जबकि इनके पिता भी चुनाव लड़ने के प्रबल दावेदार है. 'ऐसे में एक परिवार दो दावेदार' की इस समस्या को बीजेपी केसे हल करेंगी यह तो बाद में पता चलेगा. फिलहाल तो इन पिता-पुत्रों ने अपनी-अपनी दावेदारी पेश करनी शुरु कर दी है.

पिता-शिवराज सिंह चौहान, बेटा-कार्तिकेय चौहान
विधानसभा चुनाव लड़ने में जिन पिता-पुत्र की जोड़ी सबसे ऊपर नजर आ रही हैं, उनमें खुद सीएम शिवराज सिंह और उनके पुत्र कार्तिकेय चौहान शामिल है. सीएम तो चुनाव लड़ेंगे ही, जबकि उनके पुत्र भी बुधनी विधानसभा में लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं. हालांकि कार्तिकेय चुनाव लड़ने की बात से इन्कार करते है. लेकिन, जिस तरह से वो चुनाव प्रचार में जुटे है उससे उनके चुनाव लड़ने के पूरे आसार नजर आ रहैं है. वेसे भी सीएम शिवराज ने 2013 का चुनाव दो सीटों बुधनी और विदिशा से लड़ा था. दोनों सीटों से चुनाव जीतने के बाद सीएम ने विदिशा सीट खाली कर दी थी. अगर ऐसे ही हालत इस बार बने तो पिता-पुत्र की यह जोड़ी विधानसभा पहुंच सकती हैं।

पिता-कैलाश विजयवर्गीय, बेटा-आकाश विजयवर्गीय
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और कैलाश विजयवर्गीय वर्तमान में महू विधानसभा सीट से विधायक है. लेकिन, इस बार उनके पुत्र आकाश विजयवर्गीय ने भी इशारो-इशारों में चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर कर दी है. कैलाश भी अपने पुत्र को राजनीति में स्थापित करना चाहते है. इसी के चलते आकाश अपने पिता के विधानसभा क्षेत्र के साथ-साथ इंदौर की अन्य विधानसभा सीटों में भी सक्रिय दिखाई दे रहे है. ऐसे में इस बात की पूरे आसार है कि ये इन दोनों पिता-पुत्रों की जोड़ी भी चुनाव रण में दिखाई दे. 

पिता-गोपाल भार्गव, बेटा-अभिषेक भार्गव
प्रदेश के सबसे कद्दावर मंत्रियों में गिने जाने वाले गोपाल भार्गव वर्तमान में रहली विधानसभा क्षेत्र से विधायक है. लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव में सागर लोकसभा सीट से दावेदारी करने वाले उनके पुत्र अभिषेक भार्गव अब विधानसभा चुनाव में लड़ने की तैयारी करते दिख रहे है. जबकि मंत्री भार्गव भी चाहते है उनका बेटा विधानसभा चुनाव लड़े. भाजपा युवा मोर्चा के कई पदो पर रह चुके अभिषेक का राजनीति में सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है पिछले चुनाव में पिता के प्रचार की जिम्मेदारी उन्होंने ही संभाली थी. गोपाल भार्गव इस बार भी रहली से टिकट के प्रबल दावेदार है, जबकि उनके पुत्र अभिषेक सागर जिले की देवरी विधानसभा सीट से अपनी दावेदारी कर रहे हैं. 

पिता-गौरीशंकर शेजवार, बेटा-मुदित शेजवार 
सांची विधानसभा सीट से विधायक और प्रदेश सरकार में वन मंत्री गौरीशंकर शैजवार भी अपने बेटे मुदित शैजवार को विधायक बनाना चाहते है. मुदित भी अपने पिता के विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रहे है. एकात्म यात्रा से लेकर कार्यकर्ता सम्मेलन तक सभी कार्यक्रमों की जिम्मेदारी मुदित ही संभाल रहे है. हालांकि बढ़ती उम्र के चलते शायद मंत्री शैजवार इस बार का चुनाव न लड़े, लेकिन ऐसी परिस्थिति में वह अपने बेटे को पार्टी से टिकट दिलाने की पूरी कोशिश कर रहे है. 

पिता- नरोत्तम मिश्रा, बेटा- सुकर्ण मिश्रा
प्रदेश सरकार के जनसंपर्क मंत्री और दतिया से विधायक नरोत्तम मिश्रा राज्य की राजनीति में अपने कड़क मिजाज के लिये जाने जाते है. ऐसे में मंत्री मिश्रा भी अपने पुत्र सुकर्ण को विधानसभा चुनाव लड़ाना चाहते है, सुकर्ण पूरे दतिया जिले में सक्रिय नजर आ रहे है. हाल ही में सीएम शिवराज की जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान उन्होंने जिस तरह जिम्मेदारी संभाली उसे उससे उनके विधानसभा चुनाव लड़ने की दावेदारी के तौर पर देखा गया है. नरोत्तम मिश्रा तो दतिया से चुनाव लड़ेंगे ही, जबकि उनका बेटा भी जिले की बाकि तीन सीटों में से किसी एक पर दावेदारी कर सकता है. 

पिता-नंदकुमार सिंह चौहान, बेटा-हर्ष सिंह चौहान
खंडवा से बीजेपी सांसद नंदकुमार सिंह चौहान ने इस बार विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा पार्टी के समक्ष जाहिर की है. जबकि उनके पुत्र हर्ष सिंह भी पूरे खंडवा जिले में सक्रिय नजर आ रहे है. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के पद से निष्कासित होने के बाद से ही नंदू भैया खुद तो विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे जबकि अपने पुत्र को भी रेस में लगाये हुये है. ऐसे में इन दोनों पिता पुत्रों की जोड़ी विधानसभा में नजर आ सकती है. 

पिता-प्रभात झा, बेटा-तुष्मल झा 
अपने बयानों से हमेशा खबरों में रहने वाले बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद प्रभात झा के इस बार विधानसभा चुनाव लड़ने की खबरे खूब जोर पकड़ रही हैं. जबकि जिस तरह से उनके पुत्र तुष्मल राजनीति में सक्रिय नजर आ रहे उससे उनके भी विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है. तुष्मल को भाजपा युवा मोर्चा की टीम में भी पद मिला है. ऐसे में दोनों पिता पुत्र ग्वालियर-चंबल संभाग की विधानसभा सीटों में से किसी एक-एक सीट पर अपनी दावेदारी जता रहे हैं.

पिता-जयंत मलैया, बेटा- सिद्धार्थ मलैया
दमोह से विधायक और प्रदेश सरकार में वित्तमंत्री जयंत मलैया अपने पुत्र सिद्धार्थ मलैया को विधानसभा चुनाव लड़ाने की कोशिश में जुटे है. पिछले विधानसभा चुनाव में सिद्धार्थ के चुनाव लड़ने की खबरों ने खूब जोर पकड़ा था, तब उन्हें पार्टी ने टिकट नहीं दिया था. लेकिन, इस बार वे फिर दावेदारी कर रहे है. मंत्रीजी भी अपने बेटे टिकट दिलाने के लिये अदंरूनी तोर पर पूरी कोशिश कर रहे है. हालांकि इस बार मंत्री मलैया के चुनाव न लड़ने की खबरे भी सामने आई है. अब देखना दिलचस्प होगा कि पुत्र पिता के लिये प्रचार करेंगा या फिर पिता पुत्र के लिये. 

पिता-गौरीशंकर बिसेन, बेटी-मौसम बिसेन
ऐसा नहीं है कि इस बार के चुनाव में केवल पिता-पुत्रों की जोड़ी ही नजर आ सकती है. इस रेस में पिता-पुत्री की भी एक भी जोड़ी शामिल है. प्रदेश सरकार में कृषि मंत्री गौरीशंकर बिषेन की बेटी मौसम बिषेन भी पिता के साथ विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती है. बालाघाट जिले में सक्रिय मौसम ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी दावेदारी की थी, तब उन्हें टिकट नहीं मिला था. लेकिन, इस बार वे टिकट की पूरी कोशिश में जुटी है. वेसे भी बालाघाट जिले में बिषेन परिवार का दबदबा माना जाता है, मंत्री बिषेन की पत्नी जिला पंचायत अध्यक्ष है, ऐसे में उनकी बेटी भी पिता के साथ बालाघाट जिले की किसी एक सीट से चुनाव लड़ती नजर आ सकती हैं.

पिता-नरेंद्र सिंह तोमर, बेटा-प्रबल प्रताप तोमर
केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे प्रबल प्रताप भी विधानसभा चुनाव में उतर सकते है. हालांकि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर तो विधानसभा चुनाव नहीं लडेंगे, लेकिन वह अपने बेटे को चुनाव लड़ाने की पूरी तैयारी में जुटे है. पिछले विधानसभा चुनाव में तोमर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे ऐसे में प्रबल को टिकट नहीं मिल पाया था. लेकिन, प्रबल अपनी दावेदारी पूरी मजबूती से रख रहे है. ऐसे में प्रबल के लिये उनके पिता लोगों से वोट मांगते नजर आ सकते है.

वारिसों को विरासत सौंपने की तैयारी
इन पिता-पुत्रों की जोड़ी के विधानसभा चुनाव लड़ने की खबरों से पार्टी के माथे पर भी चिंता की लकीरे बढ़ी हुई है. दरअसल, वंशवाद का विरोध करने वाली पार्टी में एक साथ वंशवाद की नई पौध सामने आ गई है. सीएम से लेकर मंत्री, सांसदों तक के पुत्र चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे है. ऐसे में बीजेपी भी फूक-फूक कर कदम रख रही है. क्योंकि इन पिता-पुत्रों का अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छा खासा प्रभाव है, ऐसे में पार्टी भी इन साधने की पूरी कोशिश में जुटी है.

MP: कांग्रेस के लिये नासूर बनी ये 31 सीटें, पांच बार से नहीं खुला खाता

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा बस होने भर की देर है, यानि किसी भी वक्त चुनाव आयोग चुनावी दुम्दुभी बजा सकता है. लिहाजा सूबे में सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी दल कांग्रेस भी जनता से वादों और दावों का दम दिखाने लगी है, अब इन वादों और दावाों का असर वोटरों पर कितना पड़ता है, ये तो भविष्य के गर्त में है. पर इतना जरूर है कि दोनों दलों में एक दूसरे का गढ़ भेदने की होड़ लगी है.

पिछले 14 सालों से मध्यप्रदेश में सत्ता का वनवास काट रही कांग्रेस इस बार जीत का दम बड़ी शिद्दत से भर रही है और उसे भरोसा भी है कि शिवराज के कुशासन और भ्रष्टाचार से जनता ऊब चुकी है, जिसका फायदा उसे आगामी चुनाव में मिलेगा. हालांकि, माहौल इतना अनुकूल होने के बावजूद भी प्रदेश की 31 विधानसभा सीटें कांग्रेस के गले की फांस बनी हैं, जहां कांग्रेस एड़ी-चोटी का जोर लगाकर भी पिछले पांच चुनावों में वहां खाता तक नहीं खोल सकी है. ऐसे में कांग्रेस इन सीटों पर इस बार हर हाल में ये तिलिस्म तोड़ने की कोशिश में है.

पिछले तीन चुनावों से लगातार हार का मुंह देख रही कांग्रेस के लिये यह चुनाव किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है. लेकिन, सूबे की 31 सीटों पर कांग्रेस को पिछले पांच चुनावों से हार का सामना करना पड़ा रहा है. इन सीटों पर पार्टी ने हर दांव-पेंच आजमाया. लेकिन, उसके प्रत्याशियों को एक बार भी जीत मयस्सर नहीं हुई. 6 अंचलों में बंटी सूबे की सियासत में हर अंचल की चार-पांच सीटों पर कांग्रेस हर बार चुनाव हार जाती है.

इन सीटों पर पांच बार से लगातार हार रही कांग्रेस
बुंदेलखंडः            सागर, रहली, दमोह, मलेहरा, महाराजपुर
विंध्यः                   रैगांव, रामपुर बघेलान, सिरमौर, त्यौथर, देवतालाब
ग्वालियर-चंबलः   अंबाह, मेहगांव, शिवपुरी, अशोकनगर, पोहरी
मध्यभारतः           गोविंदपुरा, सोहागपुर, विदिशा, शमशाबाद, सीहोर, सारंगपुर, आष्टा,
मालवा-निमाड़ः    देवास, हरसूद, खंडवा, बुरहानपुर, इंदौर-2, इंदौर-4
महाकौशलः         जबलपुर कैंट, बरघाट, सिवनी

इन सभी सीटों पर कांग्रेस को पिछले पांच चुनावों में लगातार हार मिली है. इन चुनावों में दो बार कांग्रेस ने सूबे में सरकार भी बनाई है. लेकिन, वह इन गढ़ों में सेंध लगाने में अब तक कामयाब नहीं हो सकी है.

सीटें जीतने के लिये कांग्रेस बना रही रणनीति
2018 के चुनावी दंगल में इस बार कांग्रेस इन सभी सीटों को जीतने के लिये पूरा जोर लगाती नजर आ रही है. लिहाजा, कांग्रेस इन सीटों पर केवल उन प्रत्याशियों को उतारने का मन बना रही है. जिनके चुनाव जीतने के पूरे आसार नजर आते हैं. अंदाजा लगाया जा रहा है कि कांग्रेस इन सीटों पर युवाओं को तरहीज देने के मूड में है. यही वजह है कि राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमनलाथ तक सूबे के सभी अंचलों पर नजरें गड़ाये हुए हैं, ताकि इस बार इन सीटों पर हार का तिलिस्म तोड़ा जा सके.

इतनी जल्दी क्यों टूटा कम्प्यूटर बाबा का दिल, चुनेंगे बीजेपी या देंगे शिवराज को चुनौती?

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव भले ही एक-एक कदम नजदीक आता जा रहा है, पर नेता रोजाना चार-चार कदम आगे बढ़ रहे हैं. यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में ज्यादा उथल-पुथल मची है. कौन कब किसका मुरीद हो जाये और कब किससे किसका मोह भंग हो जाये, किसी को कानो-कान खबर तक नहीं होती. खबर तब होती है जब भंडा फूटता है. इसका नजारा राजधानी भोपाल में देखने को मिला, जहां कुछ वक्त पहले तक बीजेपी का गुणगान करने वाले कम्प्यूटर बाबा अचानक अपनी कार से राज्य सरकार का स्टीकर उतरवाने लगे.

दरअसल, कम्प्यूटर बाबा ने मध्यप्रदेश सरकार के राज्य मंत्री (दर्जा प्राप्त) पद से इस्तीफा दे दिया, इसके पीछे उन्होंने साधु-संतों का दबाव बताया क्योंकि वह साधु संतों की आवाज नहीं बन पा रहे थे, लिहाजा साधु संतों ने उनसे कहा कि जब आपकी बात सरकार नहीं सुनती तो आपको सरकार का चमचा बनने की जरूरत नहीं है, जिसके चलते उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफा उन्होंने लिखित में सीएम कार्यालय को भेज दिया और सरकारी सुविधाएं भी तत्काल छोड़ दी. यहां तक कि उन्होंने अपनी कार पर लगे राज्य सरकार के स्टीकर का भी नामो निशान तक मिटवा दिया और जब तक उनके पास से पूरी तरह राज्य सरकार का एक-एक निशान नेस्त नाबूद नहीं हुआ, वह वहीं डटे रहे.

गौरतलब है कि इसी साल अप्रैल में मध्यप्रदेश सरकार ने कंप्यूटर बाबा, नर्मदानंद महाराज, हरिहरनंद महाराज, पंडित योगेंद्र महंत और भय्यूजी महाराज को राज्यमंत्री का दर्जा दिया था, जबकि भैय्यूजी महाराज ने मंत्री का दर्जा लेने से मना कर दिया था. हालांकि उसके बाद 12 जून को भय्यूजी महाराज ने इंदौर स्थित अपने आवास में खुद को गोली से उड़ा लिया था.

कम्प्यूटर बाबा शिवराज सिंह की नर्मदा सेवा यात्रा के बाद नर्मदा घोटाला रथ यात्रा निकाल रहे थे, उनके साथ साधु-संतों की पूरी फौज थी, यहां तक की पोस्टर बैनर सब छप गये थे. लेकिन यात्रा शुरू तो हो गयी पर चार कदम भी नहीं चल सकी और नर्मदा घोटाला रथ यात्रा वापस वहीं पहुंच गयी, जहां से चली थी और उस यात्रा को आगे बढ़ाने वाले खुद बढ़कर सरकारी तंत्र में शामिल हो गये. हालांकि अब कम्प्यूटर बाबा की नाराजगी के कई मायने निकाले जा रहे हैं.

कम्प्युटर बाबा की बात करें तो उनका असली नाम देव त्यागी है. बाबा खुद बताते हैं कि उनका दिमाग कम्प्युटर की तरह काम करता है और याद्दाश्त भी तेज है. इसलिए उनका यह नाम पड़ा है. हमेशा लैपटॉप भी अपने साथ रखकर चलते हैं. दिलचस्प बात यह है कि बाबा राज्य मंत्री बनने से पहले शिवराज सरकार के खिलाफ नर्मदा घोटाला रथ यात्रा निकाल रहे थे. लेकिन, जैसे ही उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा मिला तो उन्होंने यात्रा स्थगित कर दी और राम भजन की जगह बीजेपी भजन करने लगे.

सोमवार को बाबा ने अचानक इस्तीफा देकर सबको हैरान कर दिया क्योंकि इससे पहले किसी तरह की नाराजगी की बात सामने नहीं आयी थी. लिहाजा यह इस्तीफा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना है. इस बीच एक सवाल यह उठता है कि शिवराज सरकार को कोसने वाले बाबा ने राज्यमंत्री का पद ग्रहण ही क्यों किया था. पहले बाबा जिस सरकार से लड़ रहे थे, वही बाबा अचानक से सरकार के इतने मुरीद कैसे हो हुए और जब मुरीद हुए तो इतनी जल्दी दिल कैसे टूट गया. अब ये कयास लगाये जा रहे हैं कि क्या बाबा आगामी विधानसभा चुनाव में ताल ठोंकने के लिए ये सब कर रहे हैं. अब सवाल है कि बाबा बीजेपी को चुनेंगे या फिर बीजेपी को चुनौती देंगे.

Monday, 1 October 2018

MP: कांग्रेस से नाराज नहीं 'चाणक्य'! बीजेपी को चक्रव्यूह में फंसाने की है साजिश

भोपाल। मध्यप्रदेश में सियासत के रंग मौसम की तरह पल-पल बदल रहे हैं. बीजेपी-कांग्रेस एक दूसरे पर कीचड़ उछालने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. साथ ही एक दूसरे को अपने-अपने चक्रव्यूह में फंसाने की तैयारी में हैं. दोनों दलों के दिग्गज चक्रव्यूह रचने में साम-दाम-दंड-भेद सारे हथकंडे अपना रहे हैं.

दरअसल, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दौरे के दौरान उनके इर्द-गिर्द सिर्फ सिंधिया और कमलनाथ ही नजर आते हैं, जबकि चाणक्य दूर-दराज कहीं एकाध बार ही दिखाई पड़ते हैं. इसे कुछ लोग दिग्विजय सिंह की नाराजगी मान सकते हैं. पर ये नाराजगी से अधिक सियासी चाल है, जिसमें बीजेपी को कांग्रेस फंसाना चाहती है क्योंकि 6 जून को राहुल गांधी की मंदसौर रैली में भी दिग्विजय सिंह मंच पर तो थे, पर न ही वो राहुल गांधी के पास दिखे और न ही उन्हें बोलने का मौका मिला.

मंदसौर में चाणक्य की अनदेखी मान भी लिया जाय तो भोपाल और सतना-रीवा में भी दिग्विजय की सिर्फ एक झलक ही दिखी. ये झलक भी सिर्फ इसलिए थी कि किसी को ये शक न हो कि दिग्विजय सिंह नाराज हैं, बल्कि इससे लोग ये कयास लगायें कि दिग्विजय सिंह नाराज नहीं हैं बल्कि, उनकी अनदेखी की जा रही है. पर इसके पीछे की असल रणनीति ये है कि दिग्विजय सिंह को आगे करने पर बीजेपी 14 साल पुरानी कब्रें खोदनी शुरू कर देगी, जिससे पार पाना कांग्रेस के लिए मुश्किल होगा. लिहाजा राहुल गांधी दिग्विजय सिंह को जमीन पर उतारकर कमलनाथ-सिंधिया को रथ पर सवार कर लिये हैं.

कांग्रेस की व्यूह रचना ऐसी है, जिसमें बीजेपी का फंसना तय है, यदि बीजेपी कांग्रेस की चाल समझ गयी तो इस चक्रव्यूह को तोड़ सकती है, नहीं तो इस व्यूह से निकलना उसके लिए मुश्किल हो सकता है क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की नर्मदा सेवा यात्रा के प्रभाव को दिग्विजय ने नर्मदा परिक्रमा के जरिए खत्म कर दिया और फिर उसके तुरंत बाद न्याय यात्रा के जरिए जमीनी थाह ली और उसके हिसाब से रणनीति बनाई और बीजेपी के विकास को आईना दिखाया, इसी रणनीति का हिस्सा है कि दिग्विजय सिंह कांग्रेस अध्यक्ष के दोनों विशेष कमांडो को कवर दे रहे हैं, ताकि दुश्मन के वार की दिशा को बदल सकें.

बीजेपी के सामने अब सिंधिया-कमलनाथ सीना ताने खड़े हैं और बीजेपी के पास सिंधिया को घेरने के लिए उनके राजसी ठाट और टशन के सिवाय कुछ नहीं है, जबकि कमलनाथ को घेरने के लिए भी बीजेपी के पास मुकम्मल मुद्दा नहीं है. यही यदि कांग्रेस दिग्विजय को आगे करती तो बीजेपी के पास मुद्दे ही मुद्दे रहते, जिसके जरिये वह कांग्रेस का जीना मुहाल कर देती. यानि दिग्विजय सिंह ने चुप रहकर भी बीजेपी को चुप करा दिया. इससे एक फायदा कांग्रेस को और भी है कि जब भी जरूरत होगी, दिग्विजय सिंह बीजेपी को उकसाने का भी काम करेंगे, ताकि बीजेपी असंयमित होकर विवादित टिप्पणी करे और कांग्रेस उसे बीजेपी की चाल, चरित्र, चेहरा बताकर जनता के बीच उसे खलनायक के तौर पर पेश कर सके.

'चाणक्य' की बेरुखी बदल न दे चुनावी चाल! राहुल को सिंधिया-कमलनाथ पर ही ऐतबार?

भोपाल। मध्यप्रदेश में चुनावी बिगुल बजने भर की भले ही देर है. लेकिन, सत्ता पक्ष और विपक्ष चुनाव प्रचार की दुंदुभी बजा चुके हैं, 25 सितंबर को बीजेपी ने कार्यकर्ता महाकुंभ के जरिए शक्ति प्रदर्शन किया और चुनाव प्रचार का आगाज किया तो उसके ठीक एक दिन के अंतराल पर राम की तपोभूमि चित्रकूट में भगवान कामतानाथ से वनवास खत्म करने का राहुल गांधी ने आशीर्वाद मांगा.

दरअसल, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 27 सितंबर को मिशन विंध्य की शुरूआत की और दिन भर जमीनी थाह ली, रोड शो किये, जनसभा की, भीड़ भी खूब जुटी. जिसके लिए सिंधिया कमलनाथ ने जनता को थैंक यू भी बोला. लेकिन, इस भीड़ में एक चेहरा बहुत कम ही नजर आया, बस कांग्रेस की सबसे बड़ी परेशानी यही है कि वह अपने ही नेताओं को एक मंच पर लाने में कहीं न कहीं चूक जाती है, जिसका फायदा बीजेपी को मिल जाता है.

राहुल गांधी के दिन भर के कार्यक्रम में कांग्रेस के चाणक्य मंच पर दिखे. लेकिन, रथ पर नहीं, न ही दिग्विजय सिंह ने कोई ट्वीट किया न तो कोई तस्वीर शेयर की, जबकि प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया युवराज के दायें-बायें नजर आये. जिसकी वजह दिग्विजय सिंह की नाराजगी माना जा रहा है, अब नाराजगी की वजह तो कांग्रेस ही जाने, पर यही नाराजगी बीजेपी की खुशी में चार चांद लगा सकती है.

गौरतलब है कि इससे पहले 6 जून को जब राहुल गांधी मंदसौर गये थे, तब भी दिग्विजय की अनदेखी की गयी थी, उन्हें न तो भाषण देने का मौका मिला था और न ही राहुल के आस पास देखा गया था. हां, मंच पर उनकी उपस्थिति जरूर दिखी थी. पर राहुल के इर्द गिर्द सिंधिया और कमलनाथ साये की तरह मौजूद रहे, राहुल गांधी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया, जबकि राहुल को भी इस बात को समझना पड़ेगा कि मुट्ठी बांधने के लिए पांचों उंगलियों को एकजुट करना होगा, यदि एक भी उंगली बगावत करती है तो फिर मुट्ठी के मायने बदल जायेंगे.

मध्यप्रदेश में सिंधिया का प्रभाव सिर्फ ग्वालियर-चंबल अंचल में माना जाता है, जबकि कमलनाथ सिर्फ छिंदवाड़ा तक ही सीमित हैं, विंध्य में अजय सिंह तो खरगोन में अरुण यादव का प्रभाव है, पर दिग्विजय सिंह का प्रभाव कमोबेश पूरे प्रदेश में माना जाता है. यही वजह है कि कांग्रेस जब तक अपने नेताओं को एक मंच पर नहीं ला पायेगी, तब तक चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना नामुमकिन है क्योंकि नेताओं की गुटबाजी का नतीजा कार्यकर्ताओं पर भी पड़ता है और कार्यकर्ता भी खेमों में नजर आते हैं.

Thursday, 12 July 2018

जिसने आपके लिए सबकुछ छोड़ा, कभी नहीं छोड़ना उसका हाथ

ढाई अक्षर का प्यार तीन अक्षर के भरोसे के बिना अधूरा रहता है क्योंकि जब तक भरोसा पुख्ता नहीं होता तब तक प्यार के अंकुर नहीं फूटते और प्यार के अंकुर फूटते भी हैं तो उसके पेड़ बनने की संभावना बिल्कुल भी नहीं होती है। भरोसा कहने के लिए एक छोटा सा शब्द है। लेकिन इस शब्द की गहराई और विशालता इतनी है कि इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है, कोई इसे पाने के लिए मरता है तो कोई इसके खो जाने के डर में जीता है, जबकि कोई साबित करने के लिए दिन-रात जूझता है। जिसने भरोसा जीत लिया है, उसके लिए उस भरोसे को कायम रखने की चुनौती होती है क्योंकि इस भरोसे में शक का एक भी तिनका पड़ा तो भरोसे की इमारत पलक झपकते ही जमींदोज हो जाती है, फिर वह इमारत कभी वैसी नहीं बन पाती और बनी तो उसके गिरने का खतरा हर पल मंडराता रहता है।

इश्क-मोहब्बत की दुनिया में भरोसे के बिना कुछ भी नहीं होता, इसी भरोसे के दम पर कोई भी लड़का किसी अजनबी लड़की का हाथ पकड़ लेता है, जबकि यही भरोसा किसी भी लड़की को उसकी पुरानी दुनिया से जुदा कर देती है। उस भरोसे के आगे वह अपने मां-बाप व परिवार का भरोसा भी तोड़ देती है। ऐसा करने के बाद उसके पास सिर्फ एक ही कंधा होता है जिस पर वह अपना सिर रखकर आंसू बहा सकती है, उसी कंधे के सहारे उठकर खड़ी हो सकती है, लेकिन ऐसे में उसके बेसहारा होने का चांस भी बना रहता है। जो लड़की किसी लड़के पर भरोसा करके अपना घर-परिवार मां-बाप सब छोड़ जाती है, भरोसा टूटने पर न तो उसे समाज स्वीकार करता है, न परिवार। इसलिए लड़कियों को भी चाहिए कि बहुत सोच समझकर जिंदगी का फैसला करें क्योंकि लड़कों के लिए घर वापसी के भी चांस रहते हैं और उन्हें कुछ वक्त बाद समाज भी स्वीकार कर लेता है, जबकि ऐसा लड़कियों के साथ नहीं होता।

वहीं लड़के के लिए भी जरूरी है कि किसी लड़की का हाथ तभी थामे, जब वह ताउम्र उसका साथ निभा सके क्योंकि कई बार लड़के मौज-मस्ती के चक्कर में किसी लड़की को उसके घर परिवार से जुदा करके पूरी उम्र के लिए बेसहारा कर देते हैं, जो लड़के ऐसा करते हैं, उनको भी सोचना चाहिए कि यदि उनके परिवार की किसी लड़की के साथ कोई लड़का ऐसा करे तो फिर उनको कैसा लगेगा। इसलिए हमेशा दोनों को एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। अगर आप भी किसी से मोहब्बत करते हैं तो उस मोहब्बत के लिए जीना सीखिए, उस इश्क के लिए मरना सीखिए या फिर इश्क-विश्क के चक्कर में पड़ने से तौबा कर लीजिए।

एक लड़की जो किसी लड़के के प्यार में जीने-मरने को तैयार रहती है। उसके लिए वह हर कुर्बानी देने को तैयार होती है, किसी लड़की के लिए उसकी आबरू से बढ़कर कोई और कुर्बानी हो नहीं सकती, लेकिन अपने प्रेमी पर वह अपनी आबरू भी बड़े शौक से लुटा देती है क्योंकि वह इस उम्मीद में ऐसा करती है कि उसकी पूरी दुनिया वही है, उसी के दम पर वह इस जमाने से भी लड़ लेगी, बहुत बार ऐसा होता भी है, लेकिन कहते हैं कि एक मछली पूरे तालाब को बदनाम कर देती है, बस यही बदनामी कभी-कभार मर्द जाति के किसी एक तिनके द्वारा कर दी जाती है, जिसका खामियाजा कइयों को भुगतना पड़ता है क्योंकि उसे देखकर कई लोग उस युवती को आगाह करते हैं तो कई उसको सतर्क रहने के तौर-तरीके बताते हैं। फिर वह लड़की भी उस मंजर को देखकर अंदर तक सिहर जाती है, हर पल इस खौफ में जीने लगती है कि न जाने उसका क्या होगा। हालांकि, लड़कियां भी बेवफाई करने में पीछे नहीं रहती हैं, बहुत बार ऐसा भी होता है जब लड़कियां ज्यादा पैसेवालों का साथ पाकर पुराने साथी का साथ छोड़ देती हैं।

यूं तो प्यार कुर्बानी का दूसरा नाम होता है, प्यार की अग्नि में तपकर जो निकलते हैं वही लैला-मजनू या हीर रांझा जैसे मशहूर होते हैं। वरना न जाने कितने अनाम प्यार अंधेरी गली में गुम हो जाते हैं। लिहाजा जो भी आपके बुरे वक्त में साथ दे, आपके आंसुओं पर अपना लहू न्यौछावर करे, ऐसे लोगों से दगा करने से बचें क्योंकि ऐसे सच्चे लोग बहुत कम ही मिलते हैं। खासकर जो लोग आप पर विश्वास करते हैं, उनका विश्वास कभी भी न तोड़ें क्योंकि विश्वास जब टूटता है तो आवाज भले ही न हो, लेकिन उसकी चीख बहुत दूर तक सुनाई पड़ती है। विश्वास की इमारत जब गिरती है तब उस मलबे में न जाने कितनी विश्वास के बुत दब जाते हैं। इसलिए जिस किसी को भी सच्चा प्यार करने वाला मिले, संभव हो तो उसका हाथ जीवन भर के लिए पकड़ ले और उस प्यार की नवीनता हमेशा बनाये रखने की कोशिश भी करें, उस प्यार के बीच किसी तीसरे को बिल्कुल भी प्रवेश न करने दें। जब तक प्यार की उस इमारत में तीसरे की एंट्री बैन रहेगी, तब तक वह प्यार जिंदा रहेगा, इसलिए अपने प्यार के बीच किसी और को न आने दें और अपने प्यार को हमेशा जिंदा रखें, दिल में समाज में किस्से-कहानियों में किताबों में, तभी आपका प्यार सार्थक होगा, आपके प्यार की लोग मिसाल देंगे।

Friday, 8 June 2018

दोनों तरफ बेशुमार प्यार के बीच परदेस की नौकरी बनी दीवार

रोजाना की तरह वह ऑफिस जाने के लिए बस में सवार हुआ, बस चल पड़ी, जिसके कुछ देर बाद तक वह मोबाइल से निकलती ध्वनि को सबके कानों से बचाते हुए अपने कानों तक पहुंचाने का प्रयास करता रहा, लेकिन ध्वनि संवाहक यंत्र में कुछ त्रुटि थी, जिसकी वजह से पूरी आवाज अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पा रही थी, हालांकि वह काफी देर तक इसी उधेड़बुन में फंसा रहा और उसे पटरी पर लाने की कोशिश करता रहा, पर वह भी सरकारी सिस्टम की तरह सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा था, आखिरकार वह थक हारकर मोबाइल की गैलरी खंगालने लगा और एक-एक वीडियो को चेक करने लगा कि किस वीडियो की आवाज सही से उसके कानों तक पहुंच रही है, एकाध वीडियो की आवाज ही ध्वनि संवाहक टूटे-फूटे लफ्जों में पहुंचा पा रहा था, तभी एक वीडियो पर उसकी नजर पड़ी, जिसकी आवाज पहले से ही टूटी-फूटी थी, पर उस वीडियो को देखकर कुछ भी पढ़ने और सुनने की जरूरत नहीं बचती थी क्योंकि वह वीडियो टूटी-फूटी आवाज में होकर भी पूरा था।


उस वीडियो को देखकर वह पुराने खयालों में खो गया, अपने अतीत को याद करने लगा, वो नजारा उसके जेहन में सपनों की तरह तैरने लगा, जिसे वह कभी हकीकत में देख नहीं पाया था, उस सपने को पूरा करने के लिए उसे पूरे शरीर को भूख की ताप में जलाना पड़ता, जिसे यादों के मुकाबले जलाना काफी मुश्किल था, इसलिए वह अपना घर-द्वार छोड़ गया, बूढ़े मां-बाप को छोड़ गया, शादी के 15 दिन बाद पत्नी को छोड़ गया, इतना ही नहीं बेटी के पैदा होने के 9 महीने बाद पहली बार उसे देख पाया था, जबकि पत्नी से मुलाकात हुए करीब डेढ़ साल बीत गए थे, अपनी हर ख्वाहिश को वह इसलिए आग में जला रहा था, ताकि किसी और को किसी अभाव की आग में जलना न पड़े, ऐसे ही उसने पांच साल गुजार दिये, उसकी बेटी भी करीब 32 महीने की हो गयी, पर मुश्किल से 32 दिन भी उसके साथ नहीं बीता। ऐसे में एक बाप के उपर क्या बीत रही होगी, इसका अंदाजा शायद आपको नहीं हो, पर हां जिन लोगों के बच्चे हैं, वो लोग अच्छी तरह से उस दर्द को समझ सकते हैं।


खैर! वह बार-बार उस वीडियो को दोहराता रहा, एकाध और वीडियो भी मौजूद थे, जिसे वह जितना देखता, उतना मन ही मन रोता था, वह सोच रहा था कि आखिर जरूरतों के लिए और कितनी खुशियों की कुर्बानी देनी होगी, अपने घर के आंगन पर खिलता चांद कैसा लगता होगा, अमावस और पूनम की रात कैसी लगती होगी, करवा चौथ पर उसकी पत्नी जब अपने पति की तस्वीर देखकर अपना व्रत तोड़ती होगी तो कैसा महसूस करती होगी, शायद उस दिन उसे भी एहसास होता होगा कि काश इन जरूरतों के बदले वह खुशियां खरीद ली होती तो यूं आज उसको पति की लंबी उम्र के लिए किया जाने वाला व्रत पति की फोटो देखकर न तोड़नी पड़ती। मां की दवाई के लिए उसको दोस्तों की मदद नहीं लेनी पड़ती, न पिता को सहारा देने के लिए किसी और का इंतजार करना पड़ता। पर सबसे ज्यादा उसको उसकी बेटी की यादें तड़पाती थी, जिसे वह देखने के लिए तड़प रहा था, वह बार-बार यही सोचता था कि उसकी बेटी घर के आंगन में कैसे उधम मचा रही होगी, जो भी सामान देखती होगी, बिखेरने लग जाती होगी, नए कपड़े पहनकर वह किस-किसको दिखा रही होगी और थोड़ी देर बाद जमीन पर लोटकर कपड़ों को भी मिट्टी जैसा बना देती होगी, तब उस पर कौन कौन गुस्सा कर रहा होगा और कौन उसे बचा रहा होगा?


मां तो आखिर मां ही होती है, जो अपने बच्चे को सीने से लगाए बिना पूर्ण सुरक्षित महसूस नहीं करती, दूसरा कोई उसे छू भी दे तो मां का कलेजा फट जाता है। ऐसे में वो सोचता है कि जब सावन की रिमझिम फुहार में वह भीग रही होगी तो कौन उसे पकड़ कर ले जाता होगा, जब मिट्टी से नहा रही होगी तो कौन उसे रोकता होगा, जब बिजली कड़कती होगी तो डर के मारे किससे चिपक कर खुद को सुरक्षित महसूस करती होगी। हां, पर जब बच्चे बहुत परेशान करते हैं तो मां उनकी पिटाई भी कर देती है और बहुत गुस्से में होती है तो मां रो भी देती है, पर वह सोचता है कि जब उसकी मां उसको पीटती होगी तो कौन उसे बचाता होगा। वह किसके पीछे जाकर छिपती होगी, किसके पीछे खड़ी बेटी को देखकर उस मां का गुस्सा शांत होता होगा और कहती होगी कि चलो देखती हूं कब तक तुम्हे बचाते हैं। हालांकि, जितना वह बाप दूर बैठकर तड़प रहा होगा, उससे कम वह बेटी भी नहीं तड़पती होगी, बस फर्क इतना है कि उसे अभी उसका अंदाजा नहीं है कि उसको बाप का प्यार नहीं मिल रहा है, लंबा समय बीत जाये तो शायद वह अपने बाप को पहचाने भी नहीं, ये भी मुमकिन है, लेकिन बेशुमार प्यार दोनों तरफ है एक दूसरे पर लुटाने के लिए, बस रोटी ही बीच में दीवार बनकर खड़ी हो गयी है।


इन सब झंझावातों के बीच वह यह सोचकर भी बार-बार परेशान होता है कि बेटी उसकी कैसी होगी, जब वह बाहर जाती होगी तो न जाने कैसे और कौन लोग उसे घूरते होंगे, कैसे वह खुद को बचाती होगी, कैसी-कैसी फब्तियां कसते होंगे, भेड़ियों की नजरों से उसकी बेटी कैसे बचती होगी, ये सोच-सोचकर उसे रात को नींद नहीं आती। पूरे देश में माहौल ही ऐसा है कि अखबार पलटो या टीवी खोलो तो समाज की असलियत मुंह चिढ़ाती दिख जाती है। मासूमों के साथ होती हैवानियत रात को सोने नहीं देती। इसी उलझन में बुदबुदाते हुए न जाने कब वो नींद में सो जाता है और जब नींद से जगता है तो फिर से वही उधड़बुन शुरू, इन सबके बीच रोजमर्रा के काम भी पूरा करता था, पर दिमाग में चलता तूफान उसे कभी शांत नहीं होने देता था, जिसके चलते वह अक्सर बेचैन हो उठता था।

अविश्वास प्रस्ताव से सरकार को नहीं पर मोदी की साख को खतरा!

यही स्थिति कमोबेश उन मां-बाप की भी होती है, जिनकी बेटियां घर से बाहर पढ़ने जाती हैं या हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करती हैं, जबकि कुछ तो घर से दूर किसी परदेस में रोजी-रोटी के लिए रह रही होती हैं, उन मां-बाप को रात में कैसे नींद आती होगी, एक-एक पल उनका कैसे बीतता होगा क्योंकि घर के अंदर हो या बाहर महिलाओं के लिए खतरा हर जगह मौजूद है, पर मां-बाप के सामने जब बेटियां रहती हैं तो उनको तसल्ली रहती है। यही सब सोचते-सोचते उसका सफर न जाने कब पूरा हो गया, बस अपने गंतव्य तक पहुंच गई और सभी लोग उतरकर ऑफिस की तरफ जाने लगे, तभी किसी साथी ने उसे झकझोर कर जगाया कि कहां खो गये जनाब, आपकी मंजिल आ गई है और अब आप किराये की इस बस को खाली कर दीजिए, उसकी बात सुनकर वह भी अपनी सीट से उठा और उतरकर ऑफिस की ओर चल दिया।