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Thursday, 1 February 2018

एक करोड़ की नौकरी छोड़ शिक्षा की अलख जगाने निकले हैं पूर्वांचल के सपूत

https://www.facebook.com/Champions-Square-936292473203652/
फैजाबाद। आईआईटी खड़गपुर से एमटेक करने और कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीतने वाले सत्यपाल गुप्ता व मुकेश कुमार जो काम करने जा रहे हैं, उसे सुनकर बहुत से अभिभावक चौंक सकते हैं। सत्यपाल गुप्ता ब्रिटिश कंपनी से मिले नौकरी का ऑफर ठुकरा चुके हैं। अनुमान लगाना मुश्किल है कि जिस भारतीय समाज में युवाओं की जिंदगी का एक ही उद्देश्य पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करना होता है, वहां एक करोड़ की नौकरी को ठुकरा देना हैरान करने वाला फैसला है।


सत्यपाल इसके पीछे वजह बताते हैं कि वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं, उन्हें ये मुकाम हासिल करने के लिए दिन-रात परेशानियों से जूझना पड़ा है, वे चाहते हैं कि देश की ऐसी प्रतिभाएं जो आर्थिक अभाव में अपने सपनों से दूर हैं, उनको सही राह दिखाई जाए और हर संभव उनकी मदद की जाए। ताकि वो अपने सपनों को नई उड़ान दे सकें। यही वजह है कि उन्होंने करोड़ों की नौकरी करने से बेहतर एक ऐसे संस्थान की नींव रखना उचित समझा, जहां से उनकी रोजी-रोटी भी चल सके, साथ ही उन छात्रों की मदद भी हो जाये जो इंजीनियर बनना चाहते हैं, लेकिन उनके हालात उनके आड़े आ जाते हैं।

सत्यपाल की योजना है कि गरीब तबके के मेधावी बच्चों को फ्री में आईआईटी की कोचिंग दी जाए। बच्चों की योग्यता परखने के लिए उनकी संस्था टेस्ट आयोजित करेगी और इस टेस्ट में खुद को साबित करने वाले ऐसे छात्रों की फीस माफ की जाएगी, जिनके आर्थिक हालात उन्हें कोचिंग की फीस भरने के सक्षम नहीं बनाते। सत्यपाल ने अपने इंस्टिट्यूट का हेड ऑफिस दिल्ली, कोटा जैसे शहरों को न चुनकर यूपी के फैजाबाद जिला मुख्यालय को चुना है। इसके पीछे वे वजह बताते हैं कि उच्च आर्थिक वर्ग के बच्चे शिक्षा के लिए बड़े शहरों की ओर रुख कर जाते हैं, लेकिन पूर्वांचल में आईआईटी की तैयारी करने वाले इंस्टिट्यूट नहीं हैं, जबकि पूर्वांचल और बिहार में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। इस क्षेत्र की प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के लिए वे अपने संस्थान की शुरुआत फैजाबाद से ही करना चाहते हैं।

सत्यपाल की इस मुहिम में उनके आईआईटी के साथी जय प्रकाश गुप्ता भी शामिल हैं। सत्यपाल और उनके साथियों ने साथ मिलकर यह सपना देखा है कि शिक्षा की अलख जगाई जाए। उनके इस संस्थान में पढ़ाने वाले उनके सभी साथी आईआईटी खड़गपुर से B.Tech-M.Tech हैं, इसके अलावा (Massachusetts Institute of Technology research university in Cambridge, USA) रिसर्च कर रहे उनके साथी भरत खुराना वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के साथ ही समय समय पर फैजाबाद आकर क्लास लेंगे। सत्यपाल की तरह ही देश की प्रतिभाएं देश के लोगों के बारे में सोचें तो भारतीय युवा देश को ही नहीं विश्व को एक नई दिशा दे सकते हैं।

पढ़ाई के दौरान सत्यपाल ने देश-दुनिया के कई अवार्ड भी अपने नाम किये, जो इस प्रकार हैं।
Director at Champion square classes for IIT-JEE
Director at mBreath Technologies Pvt.Ltd
Winner of Accenture Innovation challengeWinner of Indian Innovation Challenge Design Contest (Startup 
India)
Winner of International Business Model Competition (EUREKA)
Winner of Global Business Model Competition (Empresario)
Winner of State Level Science Exhibition

Monday, 3 October 2016

बिखर रहा समाजवादी कुनबा, नेताजी पर भारी अखिलेश !

लखनऊ। देश के सबसे बड़े सूबे में विधानसभा चुनाव की आहट मिलने लगी है, बस बिगुल बजने का इंतजार है, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित योद्धा मैदान में ताल ठोक रहे हैं, तो कदद्दावर नेता शतरंज की बिसात पर मोहरों को फिट कर रहे हैं, लेकिन ये मोहरे हैं कि मानते ही नहीं, यानि मोहरे अपनी ताकत का अहसास कराने में लगे हैं। यही वजह है कि देश का सबसे बड़ा सियासी परिवार इन मोहरों की मनमानी चाल देख बेहद परेशान है, जितने भी मोहरे हैं सबकी अपनी चाल है, इस चाल को देख पार्टी की चाल निर्धारित करने वाले भी भूचाल का एहसास कर रहे हैं। क्योंकि वजीर से लेकर सिपाही तक मनमानी पर आमादा हैं।


बौना हुआ वजीरे आला का कद !

दरअसल, प्रदेश के वजीरे आला इन दिनों अपनी ही पार्टी के मुखिया से बेहद नाराज हैं। जो कई बार खुलकर भी सामने आई है। सोमवार को मुख्यमंत्री कार्यालय के उद्घाटन के वक्त भी ये नाराजगी देखने को मिली, जब सूबे के वजीरे आला और पार्टी के मुखिया रिबन काटने को लेकर झगड़ पड़े, हालांकि पार्टी मुखिया ने वजीरे आला को दरकिनार कर अपने सबसे भरोसेमंद वजीर का हाथ पकड़ कार्यालय का उद्घाटन कर दिया, जिससे उस वक्त वहां मौजूद वजीरे आला से लेकर बाकी के और वजीरों ने खुद को बौना महसूस किया।

टिकट बंटवारे में तेरा-मेरा का खेल

वहीं टिकट बंटवारे को लेकर भी अंदरूनी खींचतान मची है, सब अपने-अपने भरोसेमंद मोहरों को मैदान में उतारने की फिराक में हैं, यही वजह है कि सब अपने-अपने मोहरों को अपने मन मुताबिक मोर्चे पर सेट करने की तरकीब निकाल रहे हैं, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने उम्मीदवारों के नाम पर मुहर लगाई तो सूबे के वजीरे आला कैंची लेकर निकल पड़े, यानि किस उम्मीदवार के नाम पर कैंची चलानी है, कैसे चलानी है, इसकी तरकीब ढूंढ़ रहे हैं। क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष ने 14 पुराने उम्मीदवारों का पत्ता साफ कर दिया है और 21 उम्मीदवारों की सूची में कवियत्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के आरोपी बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी के बेटे व सारा त्रिपाठी हत्याकांड के आरोपी अमनमणि को महाराजगंज जिले की नौतनवां सीट से टिकट दे दिया है।

पार्टी मुखिया के रिमोट से चलते हैं वजीरे आला

इतना ही नहीं सूबे के वजीरे आला हर बार अपने ही फैसले के आगे बौना साबित हो जाते हैं। यानि अब तक कई ऐसे फैसले उन्होंने लिए थे, जिस पर उन्हें यू-टर्न लेना पड़ा, इसके पीछे पार्टी मुखिया का दबदबा है, जिससे साफ होता है कि पार्टी मुखिया ने जिसे वजीरे आला बनाया है, उसकी रिमोट अपने ही हाथ में रखी है, चाहे मंत्रियों की वापसी हो या विभागों का बंटवारा। हर बार वजीरे आला को मुंह की खानी पड़ी है।

रास्ते जुदा! साथ रहने का क्या अर्थ ?

सियासत में खेल सिर्फ सत्ता के लिए होता है, सत्ता पाने के लिए जोड़, तोड़, गठजोड़ आम बात है, तो जब सूबे के वजीरे आला और पार्टी मुखिया के बीच नफरत की तलवारें खिंची, तो वजीरे आला ने भी रिमोट की बैट्री निकालकर साफ कर दिया कि अब जब राहें जुदा हो रही हैं तो साथ रहने का क्या मलतब!

वोटरों को गुमराह करने की साजिश !

चुनाव से पहले इस तरह की बातें होनी आम हैं, कभी वोटरों को गुमराह करने के लिए, तो कभी उनकी सहानुभूति लेने के लिए, लेकिन अब वोटर भी सियासत की चाल को समझने लगा है, जो मौका देखकर चौका लगाता है और सियासतदानों को अपने वोट से चोट देता है। अब इस सियासी परिवार में मचे कलह को लोग अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं, क्योंकि ऐन चुनाव के वक्त ही ये उठापटक क्यों हैं, आखिर क्यों वजीरे आला साढ़े चार साल तक पार्टी मुखिया के इशारों पर नाचते रहे, चुनाव से ठीक पहले ही उन्हें क्यों याद आया कि वो काठ के पुतले की तरह पार्टी मुखिया के इशारों पर नाच रहे हैं, या उन्हें कोई जामवंत मिल गया, जो उनको उनकी ताकत का अहसास करा दिया, जिसके बाद वो पार्टी मुखिया से खफा हो गए।

साभार ईनाडु इंडियाः  http://hindi.eenaduindia.com/State/UttarPradesh/2016/10/04112247/struggle-for-supremacy-in-samajwadi-party.vpf

Wednesday, 21 October 2015

सुनपेड़ में नेताओं का जमघट

सुनपेड़ा में मजमा लगा है नेताओं का...सियासतदानों का...कांग्रेस, बीजेपी, बीएसपी, सीपीएम, इनेलो जैसी तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं और प्रमुखों का जमावड़ा लगा है...सब के सब चीख रहे हैं...एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं...लेकिन कोई नहीं कहता की वो खुद इस घटना का जिम्मेदार है...कोई कहे भी कैसे..क्योंकि यही तो वो दर्द की भट्टी है जिस पर सियासी रोटियां बड़ी करारी सिकती हैं...क्या कोई भी पार्टी देश में अमन चैन चाहती नहीं हैं! यदि ऐसा नहीं होता तो देश प्रदेश को दंगों का दंश नहीं झेलना पड़ता! अब नेता झूठा दिखावा कर रहे हैं...घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं...छाती पीट पीट कर दबंगों को कोस रहे हैं सरकार और पुलिस प्रशासन को कोस रहे हैं...सियासी सहानुभूति दिखा रहे हैं...लेकिन सच तो ये है कि इसकी जरा भी उन्हे चिंता नहीं है...चिंता है तो सिर्फ वोट बैंक की...फरीदाबाद के बल्लभगढ़ के सुनपेड़ा में दबंगों ने दलित परिवार को जिंदा आग में झोंक दिया गया...जिसमें दो बच्चों की मौत हो गयी...जबकि पति पत्नी का गंभीर अवस्था में दिल्ली के सफदरगंज में इलाज चल रहा है...ये घटना निश्चित रूप से निंदनीय है...मानवता को शर्मसार करने वाली है...जिसने दिल दिमाग को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है...इस घटना ने 21 अप्रैल 2010 के घाव को ताजा कर दिया...जब हिसार के मिर्चपुर गांव में दबंगों ने दलित बस्ती को आग के हवाले कर दिया था...उनके पुनर्वास की व्यवस्था की गई है...फिर भी दबंगों के डर से दलित समुदाय गांव में जाने से घबराते हैं...लेकिन इस घटना के पीछे की कहानी कुछ और ही है...दरअसल 5 अक्टूबर 2014 को सुनपेड़ में मामूली मोबाइल विवाद में गांव के सरपंच और पूर्व सरपंच के बीच जानलेवा वॉर शुरू हो गया...जिसमें अब के आरोपी परिवार के तीन लोगों की हत्या कर दी गई थी...जिसमें करीब 13 दोषी ठहराए गए..उनमें से 7 लोग अब भी जेल में बंद हैं...तब से वहां पुलिस तैनात है...फिर पुलिस की मौजूदगी में हुई ये घटना व्यवस्था पर सवाल उठाती है...कि आखिर इसके पीछे किसी की साजिश तो नहीं है...इस घटना को उसी क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है...जो आज दलित के नाम पर रोना रो रहे हैं...तब उनमें इतनी ताकत कहां से आ गयी थी जब उन्होने तथाकथित दबंगों को मौत के घाट उतार दिया था...ये दलितों का विरोध नहीं है बल्कि एक जायज सवाल है।

Wednesday, 20 May 2015

कलम की आवाज: नया नेतृत्व, नई क्रांति

कलम की आवाज: नया नेतृत्व, नई क्रांति: इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाय , तो उस दौर में न बीजेपी दिखाई पड़ती थी और ना ही कांग्रेस...बस इकलौता एक क्षेत्रीय दल था , जिसने उत...

नया नेतृत्व, नई क्रांति

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाय, तो उस दौर में न बीजेपी दिखाई पड़ती थी और ना ही कांग्रेस...बस इकलौता एक क्षेत्रीय दल था, जिसने उत्तरांचल की आजादी की जंग छेड़ी और आज के उत्तराखंड के लिए उत्तराखंडियों के बीच अलख जगाई थी। लोगों के दिलों में गुस्सा था। मन में सुनहरे उत्तराखंड का सपना, मानो बेहतर प्रदेश की सूरत हिचकोले ले रही थी। उस दौर की लड़ाई में वहां रहने वालों को बस आजादी के सिवाय कुछ और नहीं दिखता था। अलग राज्य की धधकती ज्वाला में मानो एक दल तप रहा था। उसी तपन, दिल की धड़कन और आजादी की दीवानगी ने एक दल को जन्म दिया। जिसका सरोकार भी क्रांति से था, लिहाजा उसका नामकरण भी ठीक वैसे ही हुआ, जैसा उसका स्वभाव था। उत्तराखंड क्रांति दलइस क्रांति की ज्वालामुखी में सारे जुल्मों सितम जलकर खाक हो गए। केंद्र से राज्य तक ने घुटने टेक दिए, मसलन तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को अलग उत्तरांचल का एलान करने के लिए मजबूर होना पड़ा। तब आजाद उत्तराखंड की सुहानी सुबह में धीरे धीरे क्रांति की आग शांत होने लगी। क्योंकि उत्तराखंड आजाद हो गया था। वहां की हुकूमत पर किसी की सियासत नहीं चलती थी। लिहाजा खुशी में धीरे धीरे पुराने जख्म भरने लगे। और उत्तराखंड क्रांति दल सियासत के मैदान से दूर अपने अंत को तलाश रहा था। इस बीच ऐसा लगा कि मानो उत्तराखंड पर काबिज बीजेपी और कांग्रेस ने फिर से उत्तराखंड को जंजीरों में जकड़ लिया हो। उत्तराखंड को बेड़ियों में जकड़ता देख उत्तराखंड क्रांति दल मानो जख्मी शेर की तरह दहाड़ मारने लगा। जिसने बीजेपी, कांग्रेस तक की नींव हिला दी। क्योंकि उक्रांद की बहादुरी त्याग और बलिदान से सियासत के सूरमा भलिभांति परिचित थे। लिहाजा उसकी दहाड़ सुन सबके कान खड़े हो गए।
मुमकिन था कि ये दल लोगों के लिए सूबे में तब पहला विकल्प था। लेकिन आपसी लड़ाई ने इस दल के रुप को कुरूप कर दिया। तमाम रेखाओं को मिटा डाला, पदचिन्हों तक को मिटा दिया। इस दल की अवधारणा तब हुई थी। जब यूपी के पहाड़ी जिलों को राज्य बनाने की बात चल रही थी। लेकिन किसी भी कीमत पर यूपी को ये बंटवारा मंजूर नहीं था। मसलन जंग का आगाज होना लाजमी था। जिसके लिए साहसी लोगों की जरुरत थी। इस जरुरत को पूरा करने के लिए 26 जुलाई 1979 को आजादी के मतवालों ने उत्तराखंड क्रांति दल का गठन किया। तब से शुरू ये जंग अब तक समाप्त नहीं हो पाई है। बस कुछ समय के लिए शांत जरूर हो जाती है। मसलन अब ये जंग फिर से उफान पर है। और इस बार इस दल ने बाकी राजनीतिक दलों को उत्तराखंड से खदेड़ने की जंग छेड़ दी है। उत्तराखंड क्रांति दल लंबे समय से उपेक्षित हिमालयी क्षेत्र के विकास के लिए एक सफल आंदोलन के रूप में उभरा। जिसका मकसद उत्तराखंडियों की आवाज बुलंद करना था। उनको उनका अधिकार दिलाने का था। जब लोगों की भावनाओं का हनन होने लगा। सूबे के लोगों पर आंच आने लगी, अधिकारों पर डाका पड़ने लगा। तो, यहां टकराना जरुरी था।
जंग की आहट सुनाई पड़ी तो मानो उत्तराखंड क्रांति दल भी नींद से जाग गया। क्योंकि आजाद हवा में सांस लेने वाले मतवालों को गुलामी की बेड़ियां कैसे जकड़ पाती। अब जाग गये तो बस जाग ही गए, फिर नींद कहां आने वाली है और अंगड़ाई लेने के साथ ही नई उर्जा के संचार के लिए इस क्रांति की जिम्मेदारी मजबूत और नौजवान कंधों पर डाल दी। इससे पहले काशी सिंह एरी जैसे कुशल रणनीतिकार के जिम्मे थी। जो अब पार्टी को और मजबूती देना चाहते थे। लिहाजा दल को नई उर्जा देने की जिम्मेदारी, दल को सजाने संवारने की जिम्मेदारी युवा कुशल और होनहार पुष्पेश त्रिपाठी को सौंपी गई। अब उम्मीद है कि इस दल की क्रांति फिर से एक नई क्रांति लाएगी और उत्तराखंड और उत्तराखंडियों को अपने सपनों का उत्तराखंड मिलेगा।

नोट- ये मेरे निजी विचार हैं।

Thursday, 14 May 2015

कलम की आवाज: केजरीवाल को चिठ्ठी

कलम की आवाज: केजरीवाल को चिठ्ठी: दिल्ली का के ’ जरी ’ वार इतना निकम्मा हो जाएगा। किसी ने चुनाव के वक्त ऐसा नहीं सोचा था, लेकिन सत्ता है ये, सियासत में ऐसा होता है। जब सि...

केजरीवाल को चिठ्ठी

दिल्ली का केजरीवार इतना निकम्मा हो जाएगा। किसी ने चुनाव के वक्त ऐसा नहीं सोचा था, लेकिन सत्ता है ये, सियासत में ऐसा होता है। जब सियासत का रंग चढ़ता है, तो घोड़ों, गधों को भी अपनी जमात में शामिल कर लेता है। सब पर एक ही रंग चढ़ जाता है। अपार बहुमत मिल जाए, तो जुबान और दिल दिमाग पर तानाशाही कुंडली मारकर बैठ जाती है। ऐसे में केजरीवाल भला आलोचना कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। दिल्ली सरकार, आम आदमी पार्टी और अपनी नाकामियों, मनमानियों को दिखाने पर मीडिया की हत्या करने पर उतारू हो गए। बाकायदा सर्कुलर जारी कर मीडिया को खुलेआम धमकी दी, कि यदि किसी भी माध्यम से सरकार की छवि खराब की गयी तो, उस संस्थान, पत्रकार पर मानहानि का दावा करेंगे। खैर, बेचारे केजरीवाल को जनता ने सरताज तो बना दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसके अरमानों पर पानी फेर दिया। कोर्ट ने मीडिया के खिलाफ जारी सर्कुलर पर रोक लगा दी। अब क्या करे बिचारा केजरीवाल, ये तो वही हाल हुआ, खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। कान खोल कर सुन लो अरविंद केजरीवाल, मीडिया आपकी बपौती नहीं है। तुम्हारे इशारों पर नाचने वाली कठपुतली नहीं है। प्रजातंत्र का महत्वपूर्ण अंग है मीडिया, या कहें कि चौथा स्तंभ है। जिसके बिना लोकतंत्र अपाहिज हो जाता है। एक केजरीवाल के लिए 125 करोड़ जनता को बेवकूफ नहीं बना सकती है मीडिया। ये काम तो सिर्फ केजरीवाल और उनकी पार्टी को शोभा देता है। क्योंकि जो अधिकार पत्रकार के पास है, वो अधिकार देश के हर नागरिक के पास है। मीडिया केजरीवाल जैसा बेईमान नहीं है। जो सत्ता की लालच में अपने आदर्शों की बलि चढ़ा दे। अपने मार्गदर्शक को कुचल कर उसकी लाश पर खड़ा हो जाए। वो भी विलासिता पूर्ण जीवन के लिए, तानाशाही के लिए। ये वही केजरीवाल हैं जो दिल्ली के खंभों पर चढ़कर तार काटते थे, आए दिन खुलासा करते थे। तब मीडिया पूरे देश को बताती थी। ईमानदारी की चादर ओढ़े बेईमान भेड़िए की कहानी। वरना आज कुछ लोगों को छोड़कर कोई नहीं जानता, कि ये केजरीवाल है कौन, किस खेत की मूली है। मीडिया की पैदाइश आम आदमी पार्टी है। दिल्ली की सरकार है। याद रखना जो किसी को बनाने का माद्दा रखता है वो बिगाड़ने का माद्दा भी रखता है।


क्या सत्ता का नशा ऐसा ही होता है, जब मिलता है तो उसकी मद में इंसान अंधा हो जाता है। हो ना हो, लेकिन आप को देखकर ऐसा ही लगता है। कि आप में अरविंद केजरीवाल जैसा ईमानदार कोई और नहीं है। हां कुछ उनके भड़वें भी हैं, जिन्हे केजरीवाल ने ईमानदारी का लाइसेंस दिया है। वरना पहले वसंत से पहले पतझड़ की बहार नहीं आती, कितनों ने केजरीवाल की तानाशाही से तंग आकर पार्टी से तौबा कर लिया। लेकिन रस्सी जल गई पर बल नहीं गया। अपने खून पसीने से सींचने वाले कितने कार्यकर्ता, नेता पार्टी से नाता तोड़ गए। लेकिन केजरीवाल की अकड़ कम नहीं हुई। उपर से जिस स्वराज का जिक्र करते थे हर समय, जिस स्वराज के दम पर बड़ी बड़ी पार्टियों को चुनौती देते थे। उसका भी कत्ल कर आए। अब केजरीवाल की ये काली करतूत मीडिया दिखाए। तो भला उन्हे रास कैसे आए, वो भी जब अपार बहुमत वाली सरकार की मुखालफत के बदले खिलाफत कर रही हो मीडिया। इसलिए केजरीवाल ने भी मीडिया को पाबंद करना ही उचित समझा। ताकि उनकी करनी उजागर ना हो। ये वही केजरीवाल है जो मुझे चाहिए पूरी आजादी, मुझे चाहिए स्वराज की टोपी लगाकर चलता था। जनता की बात करता था। अब जनता की आजादी, सहूलियत की बात नहीं सिर्फ अपनी सहूलियत की बात करता है। विनाश काले विपरीत बुद्धि। ये तुगलकी फरमान ही केजरीवाल की बरबादी की नींव है। अब नींव तो पड़ गयी है बस इमारत बनने की देर है। वैसे भी मीडिया को बैन करना इतना आसान नहीं है अरविंद केजरीवाल। जय हो मीडिया, जय हो अदालत, सच्चे का बोलबाला झूठे का मुंह काला।