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Sunday, 7 October 2018

इन 17 जिलों में सबने छोड़ा था 'हाथ' का साथ, 16 जिलों में मिली एक-एक सीट

भोपाल.मध्यप्रदेश में सियासी संग्राम की उलटी गिनती शुरु हो गई है. जिसके चलते अब सूबे की फिजाओं में सियासी सरगर्मियां और जोर पकड़ेंगी. वहीं, चुनावी दंगल में विरोधी एक दूसरे को पछाड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहेंगे. फिलहाल, सूबे की सियासी फिजा पर भगवा रंग चढ़ा हुआ है, जिसे कांग्रेस इस बार फीका करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती है, जिसके चलते इस बार मुकाबला कांटे का होगा.

मध्यप्रदेश में पिछले तीन चुनावों से बीजेपी कांग्रेस को पटखनी देती आ रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी 165 सीटें जीतकर सत्ता के शिखर पर पहुंची थी, जबकि कांग्रेस को महज 58 सीटें ही मिली थी. लेकिन, पिछली बार बीजेपी की इस जीत में 52 जिलों वाले मध्यप्रदेश के 17 जिलों के मतदाताओं ने अहम भूमिका निभाई थी. इन जिलों के अंतर्गत आने वाली 65 विधानसभा सीटों में से 64 सीटें जीतकर बीजेपी ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था. जहां कांग्रेस को एक अदद सीट भी हासिल नहीं हुई थी.

इन जिलों में कांग्रेस को नहीं मिली एक भी सीट
दतिया, उमरिया, बैतूल, होशंगाबाद, रायसेन, शाजापुर, देवास, उज्जैन, रतलाम, नीमच, खंडवा, बुरहानपुर, अलीराजपुर, नरसिंहपुर, रतलाम, झाबुआ, आगर. ये वो जिले हैं जिनमें पिछली बार कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया था या यूं कहें कि इन जिलों से कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया था, जहां इस बार धाक जमाने की जुगत में कांग्रेस हर पैंतरे आजमा रही है.

इन जिलों में महज एक सीट पर मिली थी जीत
वहीं, सागर, पन्ना, दमोह, छतरपुर, कटनी, शहडोल, सिंगरौली, डिंडौरी, मंडला, हरदा, राजगढ़, सीहोर, इंदौर, मंदसौर, श्योपुर, भोपाल इन जिलों में कांग्रेस को महज एक-एक सीट से ही संतोष करना पड़ा था.

मालवा-निमाड़ में बुरी तरह पिछड़ गयी थी कांग्रेस 
मध्यप्रदेश में सत्ता की चाबी कहे जाने वाले मालवा-निमाड़ अंचल में भी कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था. यहां के 11 जिलों में कांग्रेस का खाता नहीं खुलने की वजह से सूबे में उसे इतनी बड़ी हार का सामना करना पड़ा था. ऐसे में कांग्रेस इस बार यहां पूरी ताकत के साथ मैदान में दिख रही है. यही वजह है कि कांग्रेस चुनाव अभियान की शुरुआत उज्जैन से किया है. 

इस बार पूरी तैयारी में दिख रही कांग्रेस
भले ही कांग्रेस पिछली बार 17 जिलों में अपना खाता तक नहीं खोल पायी थी. लेकिन, इस बार वह पूरी तैयारी के साथ मैदान में दिख रही है. चुनावों से पहले पार्टी प्रदेश अध्यक्ष बनाये गये कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस इस बार चुनावी जंग फतह करने की जुगत में है. वहीं, इन 17 जिलों पर भी कांग्रेस की विशेष नजर रहेगी. जहां वह इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेगी.

Wednesday, 3 October 2018

गांधी दिवस पर दिल्ली में अन्नदाता पर पुलिस की दे दनादन

जिस देश की आत्मा किसानों के दिल में बसती है. उस देश में किसानों के उत्थान की बस बातें हो रही हैं, पिछले 70 बरस से नेताओं की जुबान पर यही वादे हैं और सरकारी फाइलों में पिछले 70 बरस से यही बातें अलग अलग स्याही से लिखी जा रही हैं. पर आज तक उस स्याही का रंग किसी पन्ने पर दिखाई नहीं दिया. वह पन्ना आजादी के सात दशक बाद भी कोरा ही है.

Tuesday, 2 October 2018

मध्यप्रदेश में नीली चादर ओढ़ने की तैयारी में कांग्रेस तो माया ने भी फैलाया आंचल!

भोपाल। मध्यप्रदेश में सियासी बिगुल बजने भर की देर है, लेकिन उससे पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी सेना मजबूत करने में जी-जान से जुटे हैं। कांग्रेस-बीजेपी के सेनापति अपनी सेना में दूसरे दलों के बेहतर लड़ाकों को शामिल करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस-बसपा की पूरी सेना को अपने साथ जोड़ने की जुगत में है।

दरअसल, पहले इस बात के कयास लगाये जा रहे थे कि चुनाव से पहले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस नीले झंडे की चादर ओढ़ सकती है। कुछ दिनों पहले कुमार स्वामी के शपथ समारोह में महागठबंधन के कई नेता पहुंचे थे, वहां से जो तस्वीरें सामने आईं थी, वो नए सियासी समीकरण की तरफ इशारा कर रही थीं, जो अब वजूद में आती दिखने लगी हैं।

महागठबंधन की गांठ मजबूत होगी की नहीं, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण तो नहीं है। लेकिन, मध्यप्रदेश में बसपा-कांग्रेस के गठबंधन की पूरी संभावना है। इसके पीछे एक वजह और भी है कि एमपी में बसपा का थोड़ा ही, लेकिन वजूद तो है, जो कांग्रेस के तिनका-तिनका जोड़कर महल तैयार करने के सपने को पूरा करने में मदद कर सकता है। लिहाजा कांग्रेस पूरी कोशिश करेगी कि बसपा को उसका साथ मिले, ताकि हर विधानसभा सीट पर उसके वोट की हिस्सेदारी बढ़ सके।

बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय को-ऑर्डिनेटर जयप्रकाश की छुट्टी सिर्फ इसलिए कर दी क्योंकि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर व्यक्तिगत टिप्पणी की थी। हालांकि, राजनीति में भी सबकी अपनी-अपनी मर्यादा होती है, पर कई बार लोग अपने मन की भड़ास निकालने या फिर अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए किसी पर भी जुबानी बंदूक चला देते हैं, जोकि कई बार निशाने पर लग भी जाती है तो कई बार बैक होकर उसे ही घायल कर देती है।

सोमवार को लखनऊ में जय प्रकाश ने कहा था कि राहुल गांधी अगर अपने पिता पर गए होते तो कुछ उम्मीद भी थी, लेकिन वो तो अपनी मां पर गया है और उसकी मां सोनिया गांधी विदेशी मूल की है, उसमें विदेशी खून है इसलिए मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वो भारतीय राजनीति में कभी सफल नहीं हो सकता। वहीं राहुल को पीएम पद का उम्मीदवार बनाये जाने पर कहा था कि भारत का प्रधानमंत्री 'पेट' से नहीं बल्कि 'पेटी' से निकलता है।

ऐसा करके मायावती ने गठबंधन की गांठ को किया मजबूत
कांग्रेस-बीएसपी के साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनावी समझौते की दिशा में आगे बढ़ रही है, ऐसे में जय प्रकाश का ये बयान उस समझौते पर ब्रेक लगा सकता था, लिहाजा मायावती ने आनन-फानन में जय प्रकाश की पार्टी से छुट्टी कर दी। ऐसा करके मायावती ने उस गठबंधन की गांठ को और मजबूत कर दिया है, जिस गांठ के पड़ने की संभावना प्रबल हो चुकी है।

बीजेपी के पास अपना किला बचाने की चुनौती
हालांकि, मध्यप्रदेश में न तो कांग्रेस के पास कुछ खोने के लिए है और न ही बसपा के पास, जो कुछ खोने के लिए है, वो सब बीजेपी के पास ही है। ऐसे में यदि दोनों मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो एमपी में भी बिहार जैसी बहार आ सकती है, भले ही वह थोड़ी देर के लिए ही क्यों न हो। मुमकिन ये भी है कि यदि कर्नाटक जैसे नतीजे आये तो मध्यप्रदेश में मायावती का भी भाग्योदय हो जाये।

घर वापसी की राह देख रही कांग्रेस
कांग्रेस की भी कोशिश है कि किसी भी तरह इस बार सियासी वनवास से घर वापसी कर ले, बस इसी के चलते वह हर उस व्यक्ति, पार्टी को अपने पाले में शामिल करने की जुगत में है, जो उसकी घर वापसी की राह को आसान कर सके।

MP: बीजेपी के लिए चक्रव्यूह रच रहा विपक्ष, जुटा रहा महारथियों की फौज!

भोपाल। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने भर की देर है, उससे पहले सियासी दल एक दूसरे को मात देने की तरकीब ढूंढ रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ बीजेपी के खिलाफ पूरा विपक्ष चक्रव्यूह रच रहा है, ताकि इस बार किसी भी हाल में उसे मात दे सके। अब बीजेपी के सामने चुनौती है कि आखिर वो कौन महारथी होगा जो इस चक्रव्यूह को भेद सकेगा।

दरअसल, सभी दल सियासी चौसर पर अपने-अपने मोहरों को सेट कर रहे हैं, ताकि चुनावी मैदान मार सकें। हालांकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के पास कुछ भी गंवाने के लिए नहीं है, लेकिन किसी भी हाल में बीजेपी को सत्ता से बाहर करने की जिद है, लिहाजा दुश्मनी को तिलांजलि देकर कांग्रेस नीली चादर ओढ़ना चाहती है, जबकि साइकिल पर सवार होकर मध्यप्रदेश की सत्ता के सिंहासन से बीजेपी को गिराना चाहती है और खुद सत्तासीन होकर सियासी वनवास खत्म करना चाहती है।

चुनावी आहट मिलते ही सियासी समीकरण हर पल ऊंट की तरह करवट बदलने लगे हैं, कब कौन किससे गले मिलता है और कब किसकी पीठ में खंजर घोंप दे, कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन मध्यप्रदेश में जो सियासी समीकरण बन रहे हैं, यदि वह धरातल पर उतरे तो निश्चित रूप से बिहार जैसी बहार एमपी में भी देखने को मिलेगी। अब बीजेपी इस समीकरण के समानांतर फॉर्मूला ढूंढ रही है, ताकि विपक्ष के समीकरण को कुतर सके और कांग्रेस की घर वापसी भी रोक सके।

वहीं गुरुवार को अखिलेश यादव के भोपाल दौरे के बाद संभावनाओं को और बल मिलने लगा है कि आगामी चुनाव में कांग्रेस साइकिल सहित हाथी पर सवार हो जाये क्योंकि बसपा का कुछ तो जनाधार कांग्रेस के खाते में आयेगा, भले ही सपा का उतना प्रभाव एमपी में नहीं है, फिर भी वोटकटवा तो साबित हो ही सकती है। जो बीजेपी के विजयरथ को रोकने में मददगार साबित हो सकता है। कुल मिलाकर बीजेपी के लिए विपक्ष जो चक्रव्यूह तैयार कर रही है, उसका तोड़ अभी तक बीजेपी के पास नहीं है।

विपक्ष के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए बीजेपी का अर्जुन कौन होगा क्योंकि यहां अभिमन्यु की जरूरत नहीं है, यहां तो किसी हाल में बीजेपी को विपक्ष का चक्रव्यूह भेदना ही होगा, बीजेपी ने तो जबलपुर सांसद राकेश सिंह को अर्जुन बनाकर मैदान में उतार दिया है, लेकिन केशव जैसा कुशल सारथी नहीं बना सकी है, जो उनका हर पल मार्गदर्शन करे और दुश्मन की कमजोरियों को साधने का जुगाड़ उनको बताये। ऐसे में यदि कोई सारथी नहीं मिला तो बीजेपी नरेंद्र मोदी को चक्रव्यूह तोड़ने की जिम्मेदारी सौंप सकती है क्योंकि तब अमित शाह उनके रथ पर सवार होकर उन्हें दुश्मन की काट बतायेंगे।

लखनऊ टू भोपाल वाया दिल्ली सरपट दौड़ रही सियासी ट्रेन
लखनऊ टू भोपाल वाया दिल्ली सरपट दौड़ रही सियासी ट्रेन हर उस स्टेशन पर रुक रही है, जहां से भी सियासी फायदा मिलने की उम्मीद है, यदि यह ट्रेन सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंची तो मध्यप्रदेश में बीजेपी के लिए अपना किला दुश्मन के वार से बचाना मुश्किल होगा, जबकि बीजेपी का किला भेदने के लिए कांग्रेस उन सभी दलों को एकजुट कर रही है, जो बीजेपी के खिलाफ हैं या अलग-थलग पड़े हैं। कांग्रेस इस बार एक-एक ईंट जोड़कर सियासी महल बनाने की कोशिश में है तो कांग्रेस के हर उस ईंट को दीवार से निकालने की जुगत में है, जिसके बल पर सियासी इमारत खड़ी होनी है।

'चाणक्य' की चाल में फंसे शिवराज, उल्टा न पड़ जाये 'देशद्रोही' दांव

भोपाल। मध्यप्रदेश में सियासी संग्राम का बिगुल बजने भर की देर है। पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे की कमजोरियों पर वार करके सियासी मैदान में उतरने से पहले घायल करने की फिराक में हैं, यही वजह है कि जिस माध्यम से सवाल उठ रहे हैं, उसी माध्यम में जवाब भी मिल रहा है। अब दोनों दलों में देशभक्त और देशद्रोही साबित करने की होड़ मची है।

दरअसल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कांग्रेस की जड़ पर चोट करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि चाणक्य को चोटिल करने की उनकी रणनीति कामयाब हो जाती है तो विरोधी खेमे पर बढ़त बनाना आसान हो जाएगा।  कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में भले ही कमल को नाथ बना दिया है, सिंधिया को लोगों को साधने की जिम्मेदारी सौंपी है, लेकिन बिना चाणक्य की चाल के न तो सिंधिया को किसी का साथ मिलेगा, न नाथ को कोई नाथ की संज्ञा दे पायेगा।

मध्यप्रदेश में कांग्रेस तिनके की तरह बिखरी है, जिसे एकजुट करने की जिम्मेदारी चाणक्य को सौंपी गयी है क्योंकि चाणक्य के सिवाय किसी और नेता में बिखरे पत्तों को समेटने की क्षमता नहीं है। चाणक्य की हर चाल सुर्खियों में रहती है, ऐसे में सीएम शिवराज ने चाणक्य को देशद्रोही बताकर खुद से आफत मोल ले ली है। अब दिग्विजय ने खुद को देशद्रोही साबित करने के सबूतों का जो पासा फेंका है, वह काफी हद तक बाजी पलटने वाला हो सकता है।

सतना में जब सीएम शिवराज ने जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान दिग्विजय सिंह को देशद्रोही बताया तो उन्होंने इस मौके को लपक लिया और तब से कई बार शिवराज को निशाना बना चुके हैं, लेकिन अब तक उनका एक भी वार निशाने पर नहीं लग सका है, अब 26 जुलाई को दिग्गी राजा आखिरी पंच मारेंगे, जब टीटी नगर थाने में अपनी गिरफ्तारी देने जाएंगे, तब शिवराज को उनके देशद्रोही होने का सबूत देना होगा, ऐसा नहीं करने पर शिवराज को मुंह की खानी होगी।

तब मधुमक्खी की तरह टूट पड़ी थी कांग्रेस
इससे पहले इसी तरह का एक ट्वीट कर दिग्विजय सिंह भी औंधे मुंह गिरे थे, तब पूरी बीजेपी उन पर मधुमक्खी की तरह टूट पड़ी थी, जिसके बाद दिग्विजय को माफी मांगनी पड़ी थी। जिसमें उन्होंने लिखा था कि ये तस्वीर हमारे मित्र ने भेजी थी, लेकिन उसकी प्रमाणिकता के बिना पोस्ट कर दिया था। मुझे बिना प्रमाणिकता जांचे पोस्ट नहीं करना चाहिए था।

उल्टा पड़ रहा शिवराज का दांव
हालांकि, ऐसा बयान देकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह दिग्विजय सिंह को घेरना चाहते थे, लेकिन यह दांव उनके लिए उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है क्योंकि जब दिग्गी राजा थाने में गिरफ्तारी देने जाएंगे, तब सरकार या पुलिस किस आधार पर उन्हें गिरफ्तार करेगी, कहां से देशद्रोही साबित करने के सबूत लायेगी। ऐसे में दिग्विजय को सीएम शिवराज को झूठा साबित करने का मौका मिल जायेगा, जिसे अब से लेकर चुनाव तक कांग्रेस भुनाने से नहीं चूकेगी, वैसे भी विपक्ष, शिवराज को घोषणावीर मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करता है।

इस सावन 'घटाएं' काली नहीं बल्कि काल बनकर आयीं, 11 दिन में 6 हस्तियों को साथ ले गयीं

ग्वालियर। जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, आसपास के आशियानों को धराशायी कर देता है, फिर उसकी स्मृतियां लंबे समय तक लोगों के जेहन में जिंदा रहती हैं। ऐसे ही भारतीय राजनीति के वटवृक्ष के धराशायी होने पर चारो ओर मातम पसरा है, लोग अटलजी की छोटी से छोटी यादों को भी साझा कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि मौजूदा सावन काली घटाएं नहीं बल्कि काल लेकर आयी और अपने साथ इन हस्तियों को लेकर चली गयी।

16 अगस्त की शाम 5 बजकर पांच मिनट पर पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में आखिरी सांस ली। इसके साथ ही खामोश हो गयी वो अटलवाणी, जो अपनों के साथ-साथ गैरों के भी दिलों पर राज करती थी, पक्ष के साथ विपक्षी भी उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे। अटलजी दुनिया से रुखसत होकर भी एक जननेता, कवि, प्रखर वक्ता के रूप में अमर हो गये। ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को शुरू हुए अटल सफर 16 अगस्त 2018 को पूर्ण विराम लग गया।

13 अगस्त 2018 की सुबह सोमनाथ चटर्जी का कोलकाता के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया, 12 अगस्त को उन्हें दिल का दौरा पड़ने के बाद अस्पताल में वेंटिलेटर (लाइफ सपोर्ट सिस्टम) पर रखा गया था, वो भी एक मझे हुए राजनेता व कानूनविद थे। चटर्जी 1971 से 2009 तक लोकसभा सांसद रहे, इस दौरान जाधवपुर लोकसभा क्षेत्र से 1984 में केवल एक बार उन्हें ममता बनर्जी से मात खानी पड़ी थी। 1996 में उन्हें बेहतरीन सांसद का खिताब मिला था।

सोमनाथ की बेबाक शैली के कायल थे लोग
सोमनाथ चटर्जी का जन्म 25 जुलाई 1929 को हुआ था, उनके पिता एनसी चटर्जी हिन्दू महासभा से जुड़े थे, उन्होंने ब्रिटेन के मिडल टेंपल से बैरिस्टर की पढ़ाई की थी। उन्होंने अपने पिता की मौत के बाद रिक्त हुई सीट पर चुनाव लड़ा था, यूपीए वन में सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष बने थे, तब 2008 में अमेरिका के साथ हुए परमाणु समझौते के बाद सीपीएम में उन्हें इस्तीफा देने को कहा था, तब उन्होंने कहा था कि लोकसभा अध्यक्ष किसी पार्टी का नहीं देश का होता है।

द्रविड़ राजनीति के बड़े स्तम्भ थे करुणानिधि
दक्षिण भारत की राजनीति के मुख्य स्तंभ और तमिलनाडु के 5 बार मुख्यमंत्री रहे एम. करुणानिधि का लंबी बीमारी के बाद 7 अगस्त 2018 की शाम 6:10 बजे चेन्नई के कावेरी अस्पताल में अंतिम सांस ली। इसी साल 3 जून को करुणानिधि ने अपना 94वां जन्मदिन मनाया था, 50 साल पहले 26 जुलाई, 1969 को उन्होंने डीएमके की कमान अपने हाथों में ली और तब से मरते दम तक पार्टी के मुखिया बने रहे। उनके नाम जीत का भी रिकॉर्ड है, 12 बार विधानसभा चुनाव लड़े और हर बार जीत हासिल की थी।

इंदिरा की सरकार में सबसे ताकतवर थे धवन
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे कांग्रेस नेता आरके धवन का 81 की उम्र में निधन हो गया। दिल्ली के बीएल कपूर अस्पताल में 6 अगस्त की शाम लगभग सात बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। धनव 1990 में राज्यसभा सांसद चुने गए। कई संसदीय समितियों में शामिल रहे। धवन ने जुलाई 2012 में 75वें जन्मदिन पर 15 साल छोटी अचला से पहली शादी की थी। धवन 1962 से इंदिरा गांधी के साथ थे। 1984 में इंदिरा पर हमले के वक्त उनके साथ मौजूद थे। जब इंदिरा को अस्पताल ले जाया गया, तब धवन भी अस्पताल गए थे। बाद में इस मामले में गवाह बने। धवन इमरजेंसी के दौरान इंदिरा के चुनिंदा नेताओं में शामिल थे। उनका पूरा नाम राजिंदर कुमार था। 16 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के चिनोट में उनका जन्म हुआ था और विभाजन के बाद भारत आ गये थे।

नहीं रहे बलरामदास टंडन
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बलराम दास टंडन का 14 अगस्त को दोपहर रायपुर के आंबेडकर अस्पताल में निधन हो गया। जनसंघ के संस्थापक सदस्य और भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे टंडन ने 18 जुलाई 2014 को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल का पद संभाला था। अपने राजनीतिक करियर में टंडन पंजाब के उप मुख्यमंत्री सहित विभिन्न पदों पर रहे। छह बार विधायक रहे टंडन आपातकाल के दौरान 1975 से 1977 तक जेल में भी रहे। टंडन का जन्म एक नवंबर 1927 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था।

अजीत वाडेकर का निधन
पूर्व भारतीय टेस्ट कप्तान और पूर्व चीफ सिलेक्टर अजीत वाडेकर का 15 अगस्त 2018 को दोपहर बाद 77 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। मुंबई के जसलोक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। वाडेकर अपने दौर के उम्दा लेफ्ट हैंड बल्लेबाजों में शुमार थे। उन्होंने भारत के लिए 37 टेस्ट मैच और 2 वनडे मैच खेले। अजीत का जन्‍म एक अप्रैल 1941 में मुंबई में हुआ था, वाडेकर ने 1966 से 1974 तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला, अपने प्रथम श्रेणी क्रिकेट की शुरुआत 1958 में की थी, जबकि अंतरराष्‍ट्रीय करियर की शुरुआत 1966 में की थी।

MP: एक परिवार-दो दावेदार, विधानसभा चुनाव में उतरेंगे कई नामदार

भोपाल। मध्यप्रदेश में बीजेपी के लिए जीत की राह आसान नहीं है. जीत का चौका लगाने के लिए बेताब बीजेपी उसी चाल में फंसती नजर आ रही है, जिसके सहारे वह अब तक विरोधियों को जाल में फंसाती थी, ऐसा इसलिये कि इस बार चुनाव में 'एक परिवार दो दावेदार' की कतार लंबी है. जिससे निपटना बीजेपी के लिये किसी खास रणनीति से कम नहीं है.

दरअसल, आगामी विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश बीजेपी में वशंवाद की नई खैप तैयार हो गई है, जो इस बार चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है. वंशवाद की राजनीति का हमेंशा विरोध करने वाली बीजेपी इस बार खुद वंशवाद के आरोपों से घिरती दिखाई दे रही हैं. ऐसा इसलिये कि इस बार दस से ज्यादा नेताओं के पुत्रों ने चुनाव में उतरने की तैयारी कर ली जबकि इनके पिता भी चुनाव लड़ने के प्रबल दावेदार है. 'ऐसे में एक परिवार दो दावेदार' की इस समस्या को बीजेपी केसे हल करेंगी यह तो बाद में पता चलेगा. फिलहाल तो इन पिता-पुत्रों ने अपनी-अपनी दावेदारी पेश करनी शुरु कर दी है.

पिता-शिवराज सिंह चौहान, बेटा-कार्तिकेय चौहान
विधानसभा चुनाव लड़ने में जिन पिता-पुत्र की जोड़ी सबसे ऊपर नजर आ रही हैं, उनमें खुद सीएम शिवराज सिंह और उनके पुत्र कार्तिकेय चौहान शामिल है. सीएम तो चुनाव लड़ेंगे ही, जबकि उनके पुत्र भी बुधनी विधानसभा में लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं. हालांकि कार्तिकेय चुनाव लड़ने की बात से इन्कार करते है. लेकिन, जिस तरह से वो चुनाव प्रचार में जुटे है उससे उनके चुनाव लड़ने के पूरे आसार नजर आ रहैं है. वेसे भी सीएम शिवराज ने 2013 का चुनाव दो सीटों बुधनी और विदिशा से लड़ा था. दोनों सीटों से चुनाव जीतने के बाद सीएम ने विदिशा सीट खाली कर दी थी. अगर ऐसे ही हालत इस बार बने तो पिता-पुत्र की यह जोड़ी विधानसभा पहुंच सकती हैं।

पिता-कैलाश विजयवर्गीय, बेटा-आकाश विजयवर्गीय
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और कैलाश विजयवर्गीय वर्तमान में महू विधानसभा सीट से विधायक है. लेकिन, इस बार उनके पुत्र आकाश विजयवर्गीय ने भी इशारो-इशारों में चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर कर दी है. कैलाश भी अपने पुत्र को राजनीति में स्थापित करना चाहते है. इसी के चलते आकाश अपने पिता के विधानसभा क्षेत्र के साथ-साथ इंदौर की अन्य विधानसभा सीटों में भी सक्रिय दिखाई दे रहे है. ऐसे में इस बात की पूरे आसार है कि ये इन दोनों पिता-पुत्रों की जोड़ी भी चुनाव रण में दिखाई दे. 

पिता-गोपाल भार्गव, बेटा-अभिषेक भार्गव
प्रदेश के सबसे कद्दावर मंत्रियों में गिने जाने वाले गोपाल भार्गव वर्तमान में रहली विधानसभा क्षेत्र से विधायक है. लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव में सागर लोकसभा सीट से दावेदारी करने वाले उनके पुत्र अभिषेक भार्गव अब विधानसभा चुनाव में लड़ने की तैयारी करते दिख रहे है. जबकि मंत्री भार्गव भी चाहते है उनका बेटा विधानसभा चुनाव लड़े. भाजपा युवा मोर्चा के कई पदो पर रह चुके अभिषेक का राजनीति में सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है पिछले चुनाव में पिता के प्रचार की जिम्मेदारी उन्होंने ही संभाली थी. गोपाल भार्गव इस बार भी रहली से टिकट के प्रबल दावेदार है, जबकि उनके पुत्र अभिषेक सागर जिले की देवरी विधानसभा सीट से अपनी दावेदारी कर रहे हैं. 

पिता-गौरीशंकर शेजवार, बेटा-मुदित शेजवार 
सांची विधानसभा सीट से विधायक और प्रदेश सरकार में वन मंत्री गौरीशंकर शैजवार भी अपने बेटे मुदित शैजवार को विधायक बनाना चाहते है. मुदित भी अपने पिता के विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रहे है. एकात्म यात्रा से लेकर कार्यकर्ता सम्मेलन तक सभी कार्यक्रमों की जिम्मेदारी मुदित ही संभाल रहे है. हालांकि बढ़ती उम्र के चलते शायद मंत्री शैजवार इस बार का चुनाव न लड़े, लेकिन ऐसी परिस्थिति में वह अपने बेटे को पार्टी से टिकट दिलाने की पूरी कोशिश कर रहे है. 

पिता- नरोत्तम मिश्रा, बेटा- सुकर्ण मिश्रा
प्रदेश सरकार के जनसंपर्क मंत्री और दतिया से विधायक नरोत्तम मिश्रा राज्य की राजनीति में अपने कड़क मिजाज के लिये जाने जाते है. ऐसे में मंत्री मिश्रा भी अपने पुत्र सुकर्ण को विधानसभा चुनाव लड़ाना चाहते है, सुकर्ण पूरे दतिया जिले में सक्रिय नजर आ रहे है. हाल ही में सीएम शिवराज की जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान उन्होंने जिस तरह जिम्मेदारी संभाली उसे उससे उनके विधानसभा चुनाव लड़ने की दावेदारी के तौर पर देखा गया है. नरोत्तम मिश्रा तो दतिया से चुनाव लड़ेंगे ही, जबकि उनका बेटा भी जिले की बाकि तीन सीटों में से किसी एक पर दावेदारी कर सकता है. 

पिता-नंदकुमार सिंह चौहान, बेटा-हर्ष सिंह चौहान
खंडवा से बीजेपी सांसद नंदकुमार सिंह चौहान ने इस बार विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा पार्टी के समक्ष जाहिर की है. जबकि उनके पुत्र हर्ष सिंह भी पूरे खंडवा जिले में सक्रिय नजर आ रहे है. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के पद से निष्कासित होने के बाद से ही नंदू भैया खुद तो विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे जबकि अपने पुत्र को भी रेस में लगाये हुये है. ऐसे में इन दोनों पिता पुत्रों की जोड़ी विधानसभा में नजर आ सकती है. 

पिता-प्रभात झा, बेटा-तुष्मल झा 
अपने बयानों से हमेशा खबरों में रहने वाले बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद प्रभात झा के इस बार विधानसभा चुनाव लड़ने की खबरे खूब जोर पकड़ रही हैं. जबकि जिस तरह से उनके पुत्र तुष्मल राजनीति में सक्रिय नजर आ रहे उससे उनके भी विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है. तुष्मल को भाजपा युवा मोर्चा की टीम में भी पद मिला है. ऐसे में दोनों पिता पुत्र ग्वालियर-चंबल संभाग की विधानसभा सीटों में से किसी एक-एक सीट पर अपनी दावेदारी जता रहे हैं.

पिता-जयंत मलैया, बेटा- सिद्धार्थ मलैया
दमोह से विधायक और प्रदेश सरकार में वित्तमंत्री जयंत मलैया अपने पुत्र सिद्धार्थ मलैया को विधानसभा चुनाव लड़ाने की कोशिश में जुटे है. पिछले विधानसभा चुनाव में सिद्धार्थ के चुनाव लड़ने की खबरों ने खूब जोर पकड़ा था, तब उन्हें पार्टी ने टिकट नहीं दिया था. लेकिन, इस बार वे फिर दावेदारी कर रहे है. मंत्रीजी भी अपने बेटे टिकट दिलाने के लिये अदंरूनी तोर पर पूरी कोशिश कर रहे है. हालांकि इस बार मंत्री मलैया के चुनाव न लड़ने की खबरे भी सामने आई है. अब देखना दिलचस्प होगा कि पुत्र पिता के लिये प्रचार करेंगा या फिर पिता पुत्र के लिये. 

पिता-गौरीशंकर बिसेन, बेटी-मौसम बिसेन
ऐसा नहीं है कि इस बार के चुनाव में केवल पिता-पुत्रों की जोड़ी ही नजर आ सकती है. इस रेस में पिता-पुत्री की भी एक भी जोड़ी शामिल है. प्रदेश सरकार में कृषि मंत्री गौरीशंकर बिषेन की बेटी मौसम बिषेन भी पिता के साथ विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती है. बालाघाट जिले में सक्रिय मौसम ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी दावेदारी की थी, तब उन्हें टिकट नहीं मिला था. लेकिन, इस बार वे टिकट की पूरी कोशिश में जुटी है. वेसे भी बालाघाट जिले में बिषेन परिवार का दबदबा माना जाता है, मंत्री बिषेन की पत्नी जिला पंचायत अध्यक्ष है, ऐसे में उनकी बेटी भी पिता के साथ बालाघाट जिले की किसी एक सीट से चुनाव लड़ती नजर आ सकती हैं.

पिता-नरेंद्र सिंह तोमर, बेटा-प्रबल प्रताप तोमर
केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे प्रबल प्रताप भी विधानसभा चुनाव में उतर सकते है. हालांकि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर तो विधानसभा चुनाव नहीं लडेंगे, लेकिन वह अपने बेटे को चुनाव लड़ाने की पूरी तैयारी में जुटे है. पिछले विधानसभा चुनाव में तोमर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे ऐसे में प्रबल को टिकट नहीं मिल पाया था. लेकिन, प्रबल अपनी दावेदारी पूरी मजबूती से रख रहे है. ऐसे में प्रबल के लिये उनके पिता लोगों से वोट मांगते नजर आ सकते है.

वारिसों को विरासत सौंपने की तैयारी
इन पिता-पुत्रों की जोड़ी के विधानसभा चुनाव लड़ने की खबरों से पार्टी के माथे पर भी चिंता की लकीरे बढ़ी हुई है. दरअसल, वंशवाद का विरोध करने वाली पार्टी में एक साथ वंशवाद की नई पौध सामने आ गई है. सीएम से लेकर मंत्री, सांसदों तक के पुत्र चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे है. ऐसे में बीजेपी भी फूक-फूक कर कदम रख रही है. क्योंकि इन पिता-पुत्रों का अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छा खासा प्रभाव है, ऐसे में पार्टी भी इन साधने की पूरी कोशिश में जुटी है.