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Friday, 16 March 2018

कांच की गुड़िया की एक व्यथा

मैं शीशा हूं मेरी इज्जत नहीं, दर्द नहीं मै सह पाऊं
जो लगे एक भी ठोकर मुझको, टूटकर बिखर जाऊं
जो तराश दे कोई मुझको, महफिल की रंगत बन जाऊं
किसी गले में-किसी भवन में, चेहरे का दर्पण बन जाऊं
हर महफिल की रंगत, शीशे बिना अधूरी मैं पाऊं
जाम भी तब छलकता है, जब मैं गिलास बन जाऊं
बन गिलास आऊं दुनिया में, हर महफिल की शान बढ़ाऊं
मयखानों में बीयरबारों में, बस मैं ही मैं पुकारा जाऊं
काम हजारों है मेरा, फिर भी कहीं न इज्जत पाऊं
ए इंसान समझ मेरा मोल, ताकि मैं भी इज्जत पाऊं
नहीं चाहता दर्द मैं देना, न मान तो तेरा लहू निकाल दिखाऊं
छोटा-बड़ा नहीं कोई जग में, इज्जत देता ताकि मैं भी इज्जत पाऊं
इतनी औकात हमारी है, बिन हीरे के मैं न काटा जाऊं
तू भी खुद को कहता इंसान, बिन मेरे सजकर दिखलाए
मेरे बिना संवरना मुश्किल, दम है तो दुनिया दिखलाए
मेरे बिन दुनिया अंधों की, इक दूजे का सौंदर्य बताएं
खुद की नजरों से ओझल चेहरा, चैन भला किसको आए
दिन में दस बार जो देखे चेहरा, बिन देखे कैसे रह पाए
धरती के हर इक प्राणी को, चेहरा देखन को तरसाऊं
किसी को दाग नजर न आए, मैं दर्पण बन दाग दिखाऊं
मैं शीशा हूं मेरी इज्जत नहीं, दर्द नहीं मैं सह पाऊं।

एक करोड़ की नौकरी छोड़ शिक्षा की अलख जगाने निकले हैं पूर्वांचल के सपूत

जुबां की दास्तां

जुबां की भी कितनी, अजीब दास्तां है

32 दांतों के बीच रहे, फिर भी डंक मारती है

उगले आग जुबां जब भी, तलवारें चल जाती हैं

जब जुबां मीठी बन जाए, बिगड़े काम बनाती है

तीखी पड़े जुबां जब-जब, सिर पर जूते पड़वाती है

जुबां-भेजा से हाथ मिलाए, तो कीर्तिमान बना जाए

दिल से बात निकलती जब भी, दूर तलक है जाती

निकले बात जुबां से जब-जब, हंगामा बरपाती

जुबां पर रहे नियंत्रण जिसके, चारो ओर मिले सम्मान

साथ छोड़ दे जुबां भी जब, किस्मत का रहे न कोई मान

तलवार जुबां जब बन जाए, रक्तरहित कत्ल कर जाए

न खून बहे न घाव दिखे, घुट-घुट कर इंसां मर जाए

जब भेद जुबां का खुल जाए, सबकी नजरों में गिर जाए।

Thursday, 15 March 2018

...तो क्या अपनों ने ही योगी को हरवा दिया?

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के करीब तीन दशक पुराने अति सुरक्षित किले में बुआ-भतीजे की जोड़ी ने सेंध लगा दी और बीजेपी के सियासी सूरमा हाथ मलते रह गए, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की स्थिति 'काटो तो खून नहीं' जैसी हो गयी है, हालांकि ये जीत बे-जान पड़ी बसपा के लिए चिता पर पड़े शव में आग लगने से पहले धड़कने चलने जैसी रही, जबकि समाजवादियों की तो पूछो ही मत वो तो मारे खुशी के पागल हुए जा रहे हैं। वहीं कांग्रेस सपा-बसपा को जीत की बधाई देकर अपना दर्द छिपाने की कोशिश कर रही है और अंदर ही अंदर अपने फैसले पर पश्चाताप भी कर रही है क्योंकि इस जीत में शामिल होने से कांग्रेस को बीजेपी पर हमला करने का मौका मिल जाता। कांग्रेस इसे भी गवां दी। अब कांग्रेस, सपा-बसपा के लिए तालियां ही बजाती रहेगी या अपनी सियासी किस्मत चमकाने के लिए कोई अलादीन का चिराग ढूंढ़ कर लाएगी?
इस जीत की खुशी जितनी विपक्षी दलों में है, कमोबेश उतनी ही खुशी सत्ता पक्ष में भी है क्योंकि बीजेपी के कुछ नेताओं के गले में ये खुशी इस कदर अटकी पड़ी है, जिसका वे खुलकर न तो इजहार कर पा रहे हैं और न ही उसे पचा पा रहे हैं। कहते हैं निरंकुश राजा हो तो प्रजा निकम्मी हो जाती है, पर राजा तानाशाह हो जाए तो प्रजा को बागी बनने में देर नहीं लगती। ये दोनों उदाहरण तब और अब की सरकारों पर लागू होते हैं क्योंकि 2014 में मिले प्रचंड बहुमत के बाद बीजेपी में तानाशाही का युग आ गया, इसके पहले भी एक दौर था जब ये कहा जाता था कि इंदिरा इज इंडिया-इंडिया इज इंदिरा, खाता न बही जो केसरी कहें वही सही। केसरी कांग्रेस के लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहें और 3 जनवरी 1997 को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पीवी नरसिंह राव को रिप्लेस कर दिए थे। उससे पहले भी इंदिरा और राजीव का अहंकार भी सातवें आसमान पर रहा।

महिला दिवस विशेष: अगर ये न होतीं तो मैं न जाने कहां और क्या होता?

राजनीतिक पंडितों की मानें तो 2014 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हुई बीजेपी एक संगठन के बदले एक व्यक्ति की पार्टी बनकर रह गई, तब से लेकर अब तक कमल का एक पत्ता भी बिना उसकी इजाजत के हिलता तक नहीं, यहां तक कि उसी अहंकार का नतीजा रहा कि जिन लोगों ने बीजेपी को खड़ा करने में अपना खून-पसीना बहाया था, वो अब हाथ जोड़कर अपने बुढ़ापे का सहारा मांग रहे है, ऐसे कई नेता हैं, जो इस कदर हाशिए पर हैं। आडवाणी हों, मुरली या यशवंत चाहे शत्रुघ्न हों, सब के सब हाशिए पर चल रहे हैं, जो हाशिए पर हैं, इस हार के बाद उनके मन में भी खुशी के लड्डू फूट रहे हैं, जबकि शत्रुघ्न ने तो अपनी कड़कती आवाज से एक ही झटके में बीजेपी को खामोश कर दिया क्योंकि उन्होंने ट्वीट कर साफ कर दिया कि अहंकार और अति आत्मविश्वास इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। वहीं सुब्रमण्यम स्वामी ने तो यहां तक कह दिया कि अपनी सीट तक न बचा पाने वाले को इतना बड़ा पद देना लोकतंत्र में आत्महत्या करने जैसा है तो आजमगढ़ से सांसद रह चुके रमाकांत यादव ने कहा कि दलितों और पिछड़ों को नजरअंदाज करने से पार्टी का ये हस्र हुआ है।

एक करोड़ की नौकरी छोड़ शिक्षा की अलख जगाने निकले हैं पूर्वांचल के सपूत

हालांकि, उससे पहले योगी ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि अति आत्मविश्वास और विपक्ष की रणनीति समझने में हुई चूक हार का मुख्य कारण है, पर एक बात यहां समझना जरूरी है कि कहीं योगी खुद हार गए या हरवा दिए गए। अतीत के पन्नों को पलटने पर तो यही लगता है कि बीजेपी में योगी का बढ़ता कद पार्टी के कुछ नेताओं को रास नहीं आ रहा था, इसके पीछे एक वजह और भी हो सकती है कि वरिष्ठ नेता पहले ही मोदी के बढ़े हुए कद के सामने खुद को बौना महसूस कर रहे थे, ऐसे में उनके लिए एक और बोझ सहना बेहद नागवार लग रहा था, जिसके चलते बीजेपी का अति सुरक्षित किला एक ही झटके में जमींदोज हो गया और बीजेपी में योगी का कद भी घट गया, हालांकि केशव प्रसाद मौर्या के चेहरे की हवाइयां भले ही उड़ी हुई हैं, पर अंदर से तो उनके मन में भी लड्डू फूट रहे हैं क्योंकि अब उनकी सीट गयी तो योगी की कुर्सी पर भी खतरा मंडराने लगेगा, बस यही बात केशव के हारने के घाव पर मरहम का काम कर रहा है।

Wednesday, 14 March 2018

उपचुनाव: इन नतीजों से मोदी-योगी को सबक लेने की जरूरत

उत्तर प्रदेश के बबुआ अखिलेश यादव साइकिल सहित बुआ की हाथी पर सवार क्या हुए, बीजेपी की रातों की नींद और दिन का चैन सब गायब हो गया क्योंकि बीजेपी के गढ़ में बुआ-भतीजा की जोड़ी ने कमल को खिलने से पहले ही इस कदर मसल दिया कि वहां अब फिर से कमल खिलाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा, वैसे इन नतीजों से बीजेपी को सबक लेने की जरूरत भी है क्योंकि सिर्फ लफ्फाजी से सरकार नहीं चलने वाली है, जब से बीजेपी की सरकार बनी है, चाहे वह केंद्र में हो या यूपी में सिर्फ फालतू के मुद्दों को हवा दिया जा रहा है, जिसका कोई सरोकार नहीं है, न सरकार के पास विकास का कोई पैरामीटर है और न ही मीडिया के पास सरकार को रास्ता दिखाने का कोई उपाय।
26 साल बाद गोरखपुर में बीजेपी का किला ढहना किसी बड़े पेड़ के गिरने से कम नहीं है क्योंकि बीजेपी के अति सुरक्षित गढ़ में समाजवादी पार्टी उस वक्त सेंध लगाई है, जब पूरे देश में बीजेपी की तूती बोल रही है, उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सब भगवा ही भगवा नजर आ रहा है, ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथ से उनकी खुद की सीट का उनके हाथ से निकलना जितना पार्टी को परेशान कर रहा है, उससे कहीं अधिक योगी आदित्यनाथ को क्योंकि ये नतीजे ही उत्तर प्रदेश सरकार के एक साल के कामकाज की गवाही दे रहे हैं कि उनकी सरकार जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरी है।
वहीं यूपी के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या भी खुद की साख नहीं बचा पाए, क्योंकि उनके किले को भी बुआ-भतीजा की जोड़ी ने ढहा दिया है, अब वो भी मुंह छिपाने की जुगत खोज रहे हैं, जिन्होंने यूपी चुनाव से पहले पार्टी की बागडोर अपने हाथों में ली थी और तब जीत के बाद उनकी खूब वाहवाही भी हुई थी, लेकिन एक साल के ही अंदर तिलिस्म का इस कदर टूट जाना उन्हें सबके सामने खामोश कर दिया है, हालांकि एक बात के लिए राहत उन्हें जरूर है कि अब उनकी कुर्सी को शायद ही खतरा हो क्योंकि यदि उनकी कुर्सी गई तो योगी आदित्यनाथ की कुर्सी भी जानी तय है, क्योंकि योगी तो बीजेपी के अति सुरक्षित जोन को भी सियासी दुश्मनों से नहीं बचा पाये।

...तो क्या अपनों ने ही योगी को हरवा दिया?

यूपी के बाद अब एक नजर बिहार पर भी डालते चलें क्योंकि वहां भी बीजेपी औंधे मुंह गिरी पड़ी है। बिहार के महागठबंधन में सेंध लगाकर लालू की पार्टी को सत्ता से बेदखल कर नीतीश के साथ सत्ता के सिंहासन पर काबिज हुई बीजेपी बिहार में कमल खिलाने की जुगत में थी, पर बीजेपी का हाल तो वही हो गया कि आधी छोड़ के पूरी को धाये और पूरी के चक्कर में आधी भी जाये क्योंकि वहां आरजेडी इनके रास्ते का रोड़ा बन गयी और बीजेपी के सिपाही आरजेडी के किले में सेंध लगाने से रहे। अररिया से आरजेडी सांसद तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद यहां उपचुनाव के लिए मतदान हुआ था। जिसमें तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम ने बीजेपी प्रत्याशी प्रदीप सिंह को ऐसी पटकनी दी कि वो जान बचाकर किसी तरह मैदान से भाग निकले।

महिला दिवस विशेष: अगर ये न होतीं तो मैं न जाने कहां और क्या होता?

वहीं भभुआ विधानसभा सीट को बीजेपी आरजेडी से छीनने में कामयाब रही, जबकि जहांनाबाद विधानसभा सीट पर आरजेडी ने अपना कब्जा बरकरार रखा है। हालांकि इसके पहले भी 14 साल से मध्यप्रदेश में शासन कर रही बीजेपी वहां के उपचुनावों में फिसड्डी साबित हुई, क्योंकि शिवराज सिंह और उनकी पार्टी पूरी ताकत लगाकर भी मुंगावली, कोलारस, चित्रकूट और अटेर में कमल नहीं खिला पाई थी।

Wednesday, 7 March 2018

महिला दिवस विशेष: अगर ये न होतीं तो मैं न जाने कहां और क्या होता?

नारी, तुम्हारे किस रूप की व्याख्या करूं,
मां...
बहन...
पत्नी...
बेटी...
या फिर दोस्त...

नारी के बिना नर ही अधूरा नहीं, बल्कि ये संसार और समाज भी कभी पूरा नहीं हो सकेगा। यही वजह है कि नारी पूरे जीवन किसी न किसी रूप में साथ ही रहती है, बचपन में मां बनकर, उसके बाद बहन बनकर, फिर पत्नी बनकर हर कदम पर साथ निभाती है। इसके अलावा भी कुछ ऐसे रिश्ते हैं जो पुरूषों को नारी शक्ति होने का एहसास कराते रहते हैं, वैसे भी हर किसी के जीवन में महिला का योगदान पूरी उम्र रहता है बस समय के साथ रिश्तों में बदलाव आता रहता है।
ऐसा ही एक रिश्ता हमारे जीवन का भी टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। जब हमारी बड़ी बहन #manju_agrahari ने ये कहते हुए मुझसे सारे रुपए छीन लिये कि पाई-पाई का हिसाब रखो और जहां 1000 रुपए का काम हो वहां भी कटौती करके ही देना, उसके पीछे तर्क ये था कि 1000 के बदले 1100 देने पर भी उतना ही काम होगा और 900 देने पर भी वह काम रुकेगा नहीं। इस फॉर्मूले पर जो मैं आगे बढ़ा तो फिर कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा। जीवन में कई ऐसे दौर भी आए हैं, जब नारी शक्ति ने मुझे खुद के होने का एहसास कराया है। मेरी मझली बहन #parvati का भी कम योगदान नहीं रहा। 

एक करोड़ की नौकरी छोड़ शिक्षा की अलख जगाने निकले हैं पूर्वांचल के सपूत 

कहते हैं कि बहन से बड़ा कोई शुभचिंतक नहीं होता, ये लाइन मेरी छोटी बहन +Priyanka Gupta पर बिल्कुल सटीक बैठती है क्योंकि जब भी मैं देर रात घर लौटता था, मेरी आवाज सुनते ही उसकी नींद उड़न-छू हो जाती थी, वैसे तो मां-पिताजी चिल्लाते रहें पर उसकी नींद तो कुंभकर्ण से भी गहरी थी, जो खुलने का नाम नहीं लेती, पर मेरी आवाज कानों में पड़ते ही अगले पल वह किचन में नजर आती, रात चाहे कितनी ही क्यों न बीत गई हो, खाना है तो ठीक नहीं तो खाना पकाना शुरू। हालांकि, मेरा भी जब घर जाना होता था तो मैं खाना घर पर ही खाता था, मेरी बहन को ये बात पता थी, इसके अलावा भी वह हर चीज पर नजर रखती थी, जैसे कपड़ा साफ करना और प्रेस करना। हां, एक आदत उसकी और भी थी, जो मुझे बहुत प्रभावित करती थी, मैं जब भी परदेस जाता, मेरे किसी पैंट या शर्ट की जेब में जो भी उसके पास रुपए होते थे वह उसमें चुपके से रख देती थी, जो कई बार मेरे मुश्किल दौर में काम आता था और हां, एक मेरी छोटी बहन ही है जो मेरे चेहरे को ठीक से पढ़ पाती है। बाकी तो अब तक कोई भी नहीं पढ़ सका, यहां तक की मेरी मां और मेरी अर्धांगिनी भी नहीं।

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इस बीच 10 दिसंबर 2013 को जिंदगी की एक नई शुरूआत हुई, जब 'MY BETTER HALF' #jyoti मेरे जीवन में उजाला बनकर आई और हमेशा के लिए मेरी बनकर रह गई, तब से थोड़ी-बहुत नोक-झोक के बीच जिंदगी की गाड़ी पटरी पर दौड़ रही है और अब तो एक बेटी भी है जोकि ढाई साल की हो चुकी है। हालांकि, पत्नी कभी उतनी याद नहीं आती थी, जितनी बेटी याद आती है, कभी-कभार तो ऐसा लगता है कि पैसा कमाने के चक्कर में बहुत कुछ गवां दे रहा हूं और जो गवां रहा हूं, उसे बाद में कमा भी नहीं सकता क्योंकि बेटी का न तो बचपन देख पा रहा हूं और न ही उसे बड़ा होते देख पा रहा, न उसे सीने से लगाकर उसके सिर पर हाथ फेर पा रहा हूं, 4-6 महीने में 15 दिन की छुट्टी मिल भी जाती है तो चार दिन आने-जाने में गुजर जाते हैं और जब तक बेटी घुलना-मिलना शुरू करती है, तब तक काम पर लौटने का वक्त हो जाता है, जिससे उसे बाप का प्यार भी नसीब नहीं हो पा रहा है। हां, जरूरतें उसकी बेशक पूरी हो रही हैं, लेकिन खुशियों की कीमत पर।

गाजियाबाद में जब पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, उस वक्त महिला सहपाठियों का भी योगदान कम नहीं रहा क्योंकि तब तक मैं मनोरंजन की दुनिया से अनजान था, तब मेरी महिला सहपाठियों ने मुझे मनोरंजन की दुनिया से रूबरू कराया और मैं भी फिल्में देखने और गाने सुनने में दिलचस्पी दिखाने लगा। हालांकि सभी सहपाठियों से अच्छी मित्रता भी रही, पर +Deepika Mishra ने तो मुझसे किसी को नहीं रोकने-टोकने की कसम दिला दी क्योंकि मेरी आदत थी बात-बात पर रोकने-टोकने की। जो हर किसी को अच्छा नहीं लगता था, तब दीपिका ने कहा था कि जो तुम्हारी बातों पर अमल करे, उसे ही बोलो, बाकी को जाने दो।

इसके अलावा क्रिसमस-डे पर +Chhavy Singh ने जो गिफ्ट दिया था, उस पैकिंग पर लिखा संदेश आज भी मेरी डायरी में पड़ा है। गाहे-बगाहें उस पर नजर पड़ ही जाती है, जो बरबस ही पुराने दिनों की याद दिला देता है। इसके अलावा भी एक महिला मित्र है, जिसके नाम का मैं यहां जिक्र नहीं कर सकता। पर हां उसको कभी भूल भी नहीं सकता क्योंकि जब मैं पूरा देहाती था, तब उसने हमे शहरी बनाने की जिद की थी, तब मैं पहली बार जींस और टी-शर्ट पहना था। जिसे वह मेरे लिए खरीद कर लाई थी।

उसके अलावा मेरे दोस्त की पत्नी #pratima_gupta ने पहली मुलाकात में शिक्षा को लेकर इस कदर पूछ-परख की कि सारी हेकड़ी अगले पल गायब हो गयी क्योंकि प्रतिमा से हम तीन दोस्तों की पहली मुलाकात थी और पहली ही मुलाकात शायद किसी इंटरव्यू से कम नहीं था, तब हम लोगों ने फिर ठान लिया कि अब पढ़ाई आगे भी करनी है, नहीं तो शिक्षा के बिना अपना संसार अधूरा रह जाएगा और हमने फिर से कोशिशें शुरू की और स्व-रोजगार के साथ ही शिक्षा के लिए प्रयासरत रहने लगा, तब जाकर सरकारी कॉलेज में पत्रकारिता के कोर्स में दाखिला मिल पाया और पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू सफर अब (ईटीवी भारत) की डिजिटल दुनिया तक पहुंच गया है, जहां पिछले दो साल से अधिक समय बीत चुका है। आगे का सफर भी अभी हैदराबाद में ही जारी है।

दोस्त तो कई और भी मिले क्योंकि 22 साल से परदेसी बने रहने का सिलसिला जो जारी है, इस दौरान साल के साथ-साथ कई शहर भी बदले, लोग मिले भी, बिछडे़ भी, जिसमें से कुछ आज भी दिल में बसते हैं, उनमें से कुछ की कहानी भी ऐसी है जो कभी जेहन से निकल ही नहीं सकती, ऐसे में गुड़गांव में मुलाकात हुई #anamika_pandey से और हैदराबाद में मिली #neelam_tripathi। दोनों की उम्र हमसे तो कम ही है, पर उनकी कुछ कहानियों का मेरे उपर गहरा असर पड़ा।

नारी से नर होत हैं, नारी नर की खान।
नारी से ही जनम लेत हैं भक्त और भगवान।।

हालांकि 5वीं क्लास से ही मेरा संघर्ष शुरू हुआ और 9वीं के बाद घर छोड़ना पड़ गया, जिंदगी का ये सफर अविभाजित बिहार के पाकुड़ जिले से मार्च 1997 से शुरू होकर कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, नोएडा, ग्वालियर, भोपाल, राजपुरा (पंजाब), रोहतक (हरियाणा), गुड़गांव होते हुए अब हैदराबाद पहुंच गया है। इस दौरान भी कई अच्छे-बुरे लोग मिले, जिनमें से कुछ यादें तो सांसों के साथ ही खत्म होगी। पर कुछ यादें ऐसी भी हैं जिसने जिंदगी को और आसान कर दिया।
आठ मार्च (बुधवार) को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है, ये दिन महिलाओं के सम्मान को समर्पित है,  सन 1908 में 15,000 महिलाओं ने न्यूयॉर्क सिटी वोटिंग अधिकारों, बेहतर वेतन और काम के घंटे कम करने की मांग को लेकर मार्च निकाला, जिसके एक साल बाद अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी ने सन 1909 में 28 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया। जिसे सन 1910 को कोपनहेगन में मनाया गया। सन 1911 को ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में लाखों महिलाओं ने रैली निकाली। मताधिकार, सरकारी कार्यालयों और नौकरी में भेदभाव को खत्म करने जैसे कई मुद्दों की मांग को लेकर इस दिन का आयोजन किया जाता है।

Thursday, 1 February 2018

एक करोड़ की नौकरी छोड़ शिक्षा की अलख जगाने निकले हैं पूर्वांचल के सपूत

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फैजाबाद। आईआईटी खड़गपुर से एमटेक करने और कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीतने वाले सत्यपाल गुप्ता व मुकेश कुमार जो काम करने जा रहे हैं, उसे सुनकर बहुत से अभिभावक चौंक सकते हैं। सत्यपाल गुप्ता ब्रिटिश कंपनी से मिले नौकरी का ऑफर ठुकरा चुके हैं। अनुमान लगाना मुश्किल है कि जिस भारतीय समाज में युवाओं की जिंदगी का एक ही उद्देश्य पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करना होता है, वहां एक करोड़ की नौकरी को ठुकरा देना हैरान करने वाला फैसला है।


सत्यपाल इसके पीछे वजह बताते हैं कि वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं, उन्हें ये मुकाम हासिल करने के लिए दिन-रात परेशानियों से जूझना पड़ा है, वे चाहते हैं कि देश की ऐसी प्रतिभाएं जो आर्थिक अभाव में अपने सपनों से दूर हैं, उनको सही राह दिखाई जाए और हर संभव उनकी मदद की जाए। ताकि वो अपने सपनों को नई उड़ान दे सकें। यही वजह है कि उन्होंने करोड़ों की नौकरी करने से बेहतर एक ऐसे संस्थान की नींव रखना उचित समझा, जहां से उनकी रोजी-रोटी भी चल सके, साथ ही उन छात्रों की मदद भी हो जाये जो इंजीनियर बनना चाहते हैं, लेकिन उनके हालात उनके आड़े आ जाते हैं।

सत्यपाल की योजना है कि गरीब तबके के मेधावी बच्चों को फ्री में आईआईटी की कोचिंग दी जाए। बच्चों की योग्यता परखने के लिए उनकी संस्था टेस्ट आयोजित करेगी और इस टेस्ट में खुद को साबित करने वाले ऐसे छात्रों की फीस माफ की जाएगी, जिनके आर्थिक हालात उन्हें कोचिंग की फीस भरने के सक्षम नहीं बनाते। सत्यपाल ने अपने इंस्टिट्यूट का हेड ऑफिस दिल्ली, कोटा जैसे शहरों को न चुनकर यूपी के फैजाबाद जिला मुख्यालय को चुना है। इसके पीछे वे वजह बताते हैं कि उच्च आर्थिक वर्ग के बच्चे शिक्षा के लिए बड़े शहरों की ओर रुख कर जाते हैं, लेकिन पूर्वांचल में आईआईटी की तैयारी करने वाले इंस्टिट्यूट नहीं हैं, जबकि पूर्वांचल और बिहार में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। इस क्षेत्र की प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के लिए वे अपने संस्थान की शुरुआत फैजाबाद से ही करना चाहते हैं।

सत्यपाल की इस मुहिम में उनके आईआईटी के साथी जय प्रकाश गुप्ता भी शामिल हैं। सत्यपाल और उनके साथियों ने साथ मिलकर यह सपना देखा है कि शिक्षा की अलख जगाई जाए। उनके इस संस्थान में पढ़ाने वाले उनके सभी साथी आईआईटी खड़गपुर से B.Tech-M.Tech हैं, इसके अलावा (Massachusetts Institute of Technology research university in Cambridge, USA) रिसर्च कर रहे उनके साथी भरत खुराना वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के साथ ही समय समय पर फैजाबाद आकर क्लास लेंगे। सत्यपाल की तरह ही देश की प्रतिभाएं देश के लोगों के बारे में सोचें तो भारतीय युवा देश को ही नहीं विश्व को एक नई दिशा दे सकते हैं।

पढ़ाई के दौरान सत्यपाल ने देश-दुनिया के कई अवार्ड भी अपने नाम किये, जो इस प्रकार हैं।
Director at Champion square classes for IIT-JEE
Director at mBreath Technologies Pvt.Ltd
Winner of Accenture Innovation challengeWinner of Indian Innovation Challenge Design Contest (Startup 
India)
Winner of International Business Model Competition (EUREKA)
Winner of Global Business Model Competition (Empresario)
Winner of State Level Science Exhibition

Monday, 3 October 2016

बिखर रहा समाजवादी कुनबा, नेताजी पर भारी अखिलेश !

लखनऊ। देश के सबसे बड़े सूबे में विधानसभा चुनाव की आहट मिलने लगी है, बस बिगुल बजने का इंतजार है, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित योद्धा मैदान में ताल ठोक रहे हैं, तो कदद्दावर नेता शतरंज की बिसात पर मोहरों को फिट कर रहे हैं, लेकिन ये मोहरे हैं कि मानते ही नहीं, यानि मोहरे अपनी ताकत का अहसास कराने में लगे हैं। यही वजह है कि देश का सबसे बड़ा सियासी परिवार इन मोहरों की मनमानी चाल देख बेहद परेशान है, जितने भी मोहरे हैं सबकी अपनी चाल है, इस चाल को देख पार्टी की चाल निर्धारित करने वाले भी भूचाल का एहसास कर रहे हैं। क्योंकि वजीर से लेकर सिपाही तक मनमानी पर आमादा हैं।


बौना हुआ वजीरे आला का कद !

दरअसल, प्रदेश के वजीरे आला इन दिनों अपनी ही पार्टी के मुखिया से बेहद नाराज हैं। जो कई बार खुलकर भी सामने आई है। सोमवार को मुख्यमंत्री कार्यालय के उद्घाटन के वक्त भी ये नाराजगी देखने को मिली, जब सूबे के वजीरे आला और पार्टी के मुखिया रिबन काटने को लेकर झगड़ पड़े, हालांकि पार्टी मुखिया ने वजीरे आला को दरकिनार कर अपने सबसे भरोसेमंद वजीर का हाथ पकड़ कार्यालय का उद्घाटन कर दिया, जिससे उस वक्त वहां मौजूद वजीरे आला से लेकर बाकी के और वजीरों ने खुद को बौना महसूस किया।

टिकट बंटवारे में तेरा-मेरा का खेल

वहीं टिकट बंटवारे को लेकर भी अंदरूनी खींचतान मची है, सब अपने-अपने भरोसेमंद मोहरों को मैदान में उतारने की फिराक में हैं, यही वजह है कि सब अपने-अपने मोहरों को अपने मन मुताबिक मोर्चे पर सेट करने की तरकीब निकाल रहे हैं, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने उम्मीदवारों के नाम पर मुहर लगाई तो सूबे के वजीरे आला कैंची लेकर निकल पड़े, यानि किस उम्मीदवार के नाम पर कैंची चलानी है, कैसे चलानी है, इसकी तरकीब ढूंढ़ रहे हैं। क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष ने 14 पुराने उम्मीदवारों का पत्ता साफ कर दिया है और 21 उम्मीदवारों की सूची में कवियत्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के आरोपी बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी के बेटे व सारा त्रिपाठी हत्याकांड के आरोपी अमनमणि को महाराजगंज जिले की नौतनवां सीट से टिकट दे दिया है।

पार्टी मुखिया के रिमोट से चलते हैं वजीरे आला

इतना ही नहीं सूबे के वजीरे आला हर बार अपने ही फैसले के आगे बौना साबित हो जाते हैं। यानि अब तक कई ऐसे फैसले उन्होंने लिए थे, जिस पर उन्हें यू-टर्न लेना पड़ा, इसके पीछे पार्टी मुखिया का दबदबा है, जिससे साफ होता है कि पार्टी मुखिया ने जिसे वजीरे आला बनाया है, उसकी रिमोट अपने ही हाथ में रखी है, चाहे मंत्रियों की वापसी हो या विभागों का बंटवारा। हर बार वजीरे आला को मुंह की खानी पड़ी है।

रास्ते जुदा! साथ रहने का क्या अर्थ ?

सियासत में खेल सिर्फ सत्ता के लिए होता है, सत्ता पाने के लिए जोड़, तोड़, गठजोड़ आम बात है, तो जब सूबे के वजीरे आला और पार्टी मुखिया के बीच नफरत की तलवारें खिंची, तो वजीरे आला ने भी रिमोट की बैट्री निकालकर साफ कर दिया कि अब जब राहें जुदा हो रही हैं तो साथ रहने का क्या मलतब!

वोटरों को गुमराह करने की साजिश !

चुनाव से पहले इस तरह की बातें होनी आम हैं, कभी वोटरों को गुमराह करने के लिए, तो कभी उनकी सहानुभूति लेने के लिए, लेकिन अब वोटर भी सियासत की चाल को समझने लगा है, जो मौका देखकर चौका लगाता है और सियासतदानों को अपने वोट से चोट देता है। अब इस सियासी परिवार में मचे कलह को लोग अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं, क्योंकि ऐन चुनाव के वक्त ही ये उठापटक क्यों हैं, आखिर क्यों वजीरे आला साढ़े चार साल तक पार्टी मुखिया के इशारों पर नाचते रहे, चुनाव से ठीक पहले ही उन्हें क्यों याद आया कि वो काठ के पुतले की तरह पार्टी मुखिया के इशारों पर नाच रहे हैं, या उन्हें कोई जामवंत मिल गया, जो उनको उनकी ताकत का अहसास करा दिया, जिसके बाद वो पार्टी मुखिया से खफा हो गए।

साभार ईनाडु इंडियाः  http://hindi.eenaduindia.com/State/UttarPradesh/2016/10/04112247/struggle-for-supremacy-in-samajwadi-party.vpf