Search This Blog

Thursday, 16 May 2019

दरबारी प्रथा के स्वर्णिम युग में पत्रकारिता

इतिहास-भूगोल में एक मामूली सा अंतर होता है, लेकिन ये अंतर नदी के दो किनारों की तरह होता है, जो साथ चलकर भी कभी एक नहीं हो पाता. तारीख पर दर्ज एक-एक शब्द आने वाली पीढ़ियों को अतीत की सैर कराती हैं. उन्हें पुरानी नीतियों-रीतियों-परंपराओं से रुबरू कराती हैं. पर दरबारी प्रवृत्ति उन शब्दों पर चाटुकारिता का जो मसाला लगाती हैं, उससे तारीख का पूरा जायका ही खराब हो जाता है. दौर कोई भी रहा हो, राजशाही, मुगलशाही, राजपूतशाही या लोकतांत्रिक शासन प्रणाली. कभी दरबारियों की कमी नहीं रही, इन्हीं दरबारियों ने लोगों को इस कदर गुमराह किया है कि सही जानकारी न दर्ज कर उस दौर की शासन पद्धति के गुणगान में ही पूरा तारीख भर डाले.

जितनी बार तारीख का पन्ना पलटते हैं, उतनी बार अलग-अलग जानकारी मिलती है, या यूं कहें कि अपभ्रंश या विरोधाभाष देखने को मिलता है, जिससे पाठक गुमराह हो जाता है कि वह क्या सही माने और क्या गलत समझे. मसलन एक इतिहासकार अमुक बात लिखता है तो दूसरा उसका विरोध करता है, दूसरा जो लिखता है, उससे पहला इत्तेफाक नहीं रखता. यहीं से नई विचारधारा का जन्म होता है, और यही इतिहास पाठकों को विचारधाराओं के नाम पर खेमों में बांट देती है.

ऐसा ही मौजूदा सियासी दौर में भी चल रहा है. सब के सब संविधान और लोकतंत्र बचाने की दुहाई दे रहे हैं, जबकि वास्तविकता ये है कि किसी को संविधान या लोकतंत्र की चिंता नहीं है, बल्कि अपनी व पार्टी की चिंता सता रही है. इसके लिए रोजाना मर्यादा की आबरू उसे बचाने वाले ही लूट रहे हैं. इस काम में कोई पीछे नहीं है, एक सेर है तो दूसरा सवा सेर बनने की कोशिश कर रहा है. एक से बढ़कर एक बड़बोले सामने आ रहे हैं और वोट के लिए खून-खराबा करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं.

17वीं लोकसभा के लिए होने वाला आम चुनाव अंतिम दौर में है, नेता गिरगिट की तरह रंग बदलकर जनता के सामने वोट के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं और खुद को समाज का दर्पण बताने वाली मीडिया गिरगिट के रंग को भी अपने हिसाब से बदलकर प्रचारित कर रही है. पिछले कुछ दिनों में कई नामी पत्रकारों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार किया है. जिसकी पारदर्शिता-विश्वसनीयता पर सवाल उठे नहीं, बल्कि सवाल बरसे हैं. ज्यादातर साक्षात्कार में जवाब देने वाले के चेहरे पर तनाव दिखता है, और वो भी जब पांच साल के शासन का हिसाब देना हो तो चेहरे पर सिकन स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी साक्षात्कार में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा.

इन साक्षात्कारों में बड़े-बड़े पत्रकारों ने सवालों के स्तर को इतना गिरा दिया है, जितना कोई इंसान चाहकर भी नहीं गिर सकता. नरेंद्र मोदी के आम खाने से लेकर पर्स रखने, रोटी बेलने तक की बात पूछ लिये, बस अंडरवियर की बात पूछना भूल गये और ये पूछना भी भूल गये कि कितनी बार क्या-क्या खाते हैं और कितनी बार में कितना-कितना निकालते हैं. बस यूं ही मन में आ गया तो सोचा कि याद दिला दूं, शायद किसी बड़े पत्रकार की नजर इस लेख पर पड़ जाये और उसे जब भी प्रधानमंत्री से सवाल करने का मौका मिले तो वह इस सवाल को शामिल कर लेगा तो हम भी धन्य हो जाएंगे, भले ही बड़ा पत्रकार न बन पाएं, लेकिन बुढ़ापे में बच्चों को किस्से-कहानियां सुनाते समय 56 इंची सीना फुलाकर बता तो पाएंगे कि अमुक सवाल फलां पत्रकार को पूछने की सलाह हमने ही दी थी.

जब अगली पीढ़ियां अतीत के पन्ने पलटेंगी, या लाइब्रेरी में पुराने साक्षात्कार खंगालेंगी और संयोग से दो चार दिन के अंतराल में पक्ष-विपक्ष का साक्षात्कार देखेंगी तो तस्वीर साफ हो जायेगी कि उस दौर में भी पत्रकारिता किस कदर सत्ता के चरणों में पड़ी थी. उस वक्त जब युवा पीढ़ियां आपसे सवाल करेंगी तो आपके पास खुद से नजर मिलाने की भी ताकत नहीं होगी, फिर उन युवाओं का सामना करना कितना मुश्किल होगा, इसके बारे में आप भी सोचिए क्योंकि जो सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए, वो विपक्ष से पूछा जा रहा है और सरकार के खान-पान, मौज-मस्ती की बातें पूछी जा रही हैं.

चुनाव का क्या है ये तो आते-जाते रहेंगे, पांच साल में 25 दिन जनता के सामने गिड़गिड़ाने वाले बरसाती मेढक सियासी बारिश खत्म होते ही लापता हो जाएंगे, जब कभी उनका जनता से सामना हो भी जाता है तो वह गिरगिट जैसे रंग बदल लेते हैं, यानि 30 दिन चरण वंदन करने वाला नेता जनता से 330 दिन तक चरणवंदन करवाना चाहता है, लेकिन तारीख पर दर्ज दस्तावेज को कैसे मिटाएंगे. अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिये कि क्या आपने जो किया वह सही है, अभी भी वक्त है, नहीं सुधरे तो बुढ़ापे में पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं बचेगा और खुद के खोदे गड्ढे में अपनी अगली पीढ़ी को दफन होते देखकर कैसा लगेगा.

Saturday, 20 April 2019

24 साल बाद भरी दुश्मनी की खाई, एक मंच पर आये माया-मुलायम


मैनपुरी/भोपाल। 24 साल बाद दो दलों के बीच खिंची नंगी तलवारों को सियासत ने वापस म्यान में रखवा दिया है. अब दोनों दलों के नेता एक मंच पर आ गये हैं और एक साथ मिलकर तीसरे दुश्मन को पस्त करने की रणनीति बना रहे हैं, जबकि इन दोनों में से एक नेता पहले ही तीसरे दुश्मन को विजयी होने का आशीर्वाद दे चुका है. जीत का आशीर्वाद देने के बाद अब उसे ही हराने के लिए पुराने दुश्मन के साथ चल दिया है.


सियासत दूरियां बढ़ाती है तो जख्मी दिलों को भी मिलाती है. राजनीति रिश्तों की डोर तोड़ती है तो जोड़ती भी है. ऐसा इसलिए होता है कि जब दोस्त का दोस्त, दोस्त होता है तो दुश्मन का दुश्मन दोस्त बन जाता है. कई बार ऐसे समीकरण का असर आस-पड़ोस में भी देखने को मिल जाता है. न्यूटन का गति विषयक नियम है कि जब भी कोई वस्तु पानी में डूबती है तो वह अपने आकार के बराबर पानी को उपर उठाती है. ऐसा ही कुछ आजकल यूपी की राजनीति में हो रहा है, जिसका असर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर मध्यप्रदेश पर भी पड़ रहा है.

1993 में मायावती-मुलायम सिंह साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाए, लेकिन अचानक घटी एक घटना ने इस रिश्ते को एक झटके में बिखेर दिया. 5 जून 1995 को लखनऊ में हुए गेस्ट हाउस कांड ने इस रिश्ते के बीच में इतनी गहरी खाईं खोद दी, जिसे भरने में 24 साल लग गये. वो भी तब जब मुलायम सिंह की विरासत संभालने वाले उनके बेटे अखिलेश यादव ने बुआ की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया. 24 साल बाद आज दोनों एक साथ मंच पर दिखेंगे तो इसका असर यूपी की सीमा से सटे मध्यप्रदेश के लोकसभा क्षेत्रों पर भी पड़ेगा क्योंकि दोनों पार्टियां एक साथ मिलकर यूपी में चुनाव लड़ रही हैं और सीमाई इलाकों में सपा-बसपा दोनों की पकड़ मजबूत है. जिसके चलते इन संसदीय क्षेत्रों में बीजेपी-कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

दरअसल, गठबंधन के सवाल पर मायावती ने दो टूक कह दिया था कि कांग्रेस से गठबंधन पूरे देश में कहीं नहीं हो सकता क्योंकि कांग्रेस से गठबंधन करके कोई फायदा नहीं मिलने वाला है, लेकिन हर राज्य की परिस्थितियां अलग-अलग हैं. कहीं सपा-बसपा मजबूत है तो कही कांग्रेस. भले ही सपा-बसपा एक साथ कदमताल करके ज्यादा सीटें यूपी में जीत सकती हैं, लेकिन बाकी राज्यों में इनका वजूद इस कद का नहीं है कि इक्का-दुक्का सीटों से ज्यादा जीत सकें.

हालांकि, पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भी मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ आखिरी वक्त तक सपा-बसपा को मनाने में लगे रहे, पर बात नहीं बन पायी थी. अब जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस का वनवास खत्म हो चुका है, कमल को कांग्रेस ने एमपी का नाथ बना दिया है. ऐसे में कमलनाथ के सामने मध्यप्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से ज्यादातर पर जीत दर्ज करने का दबाव है. ऐसा करके कमलनाथ को कांग्रेस की कसौटी पर खरा उतरना है. ताकि दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया से उनका कद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की नजरों में बढ़ सके.

Saturday, 16 February 2019

'40 के बदले 400 लाशें-भितरघतियों के 4000, भले ही एक वक्त की रोटी कम कर दो'

पुलवामा। 14 फरवरी तारीख पर दर्ज वो काला दिन है जिसे याद कर हर देशभक्त का खून खौल उठेगा, बार-बार गद्दार पड़ोसी से हम दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं और वो कमीना पीछे से पीठ पर वार करता है, उरी के बाद पुलवामा में हुए आतंकी हमले ने हर देशवासी के खून की गर्मी को बढ़ा दिया है, तिरंगे में लिपटे भारत मां के 40 सपूतों को देखकर भला किसका दिल नहीं पसीजा होगा, पर कुछ आस्तीन के सांप ऐसे हैं, जिनके चेहरे पर खुशी दिख रही है, पर अब समय आ गया है पाकिस्तान से पहले इन गद्दारों को जन्नत भेजना होगा क्योंकि ये गद्दार नहीं होंगे तो पाकिस्तान खुद ही अपाहिज हो जायेगा, भीख के टुकड़ों पर पलने वाला ये गद्दार मुल्क जो अपनी अवाम का भी पेट नहीं भर पाता, उसकी क्या बिसात जो भारत जैसी महाशक्ति से टकराये. जितनी बार टकराया है उतनी बार अंजाम पाया है, शिमला समझौता न हुआ होता तो आज इसका नामोनिशां न होता, 90 हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण हो या पाकिस्तान के दो टुकड़े करना, लेकिन इस कमबख्त का टूटकर भी गुरूर नहीं गया. उरी के बाद भारतीय सेना ने सर्जिकल सट्राइक किया, लेकिन इस बार सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तान से पहले कश्मीर में करना होगा और यहां की खाकर वहां का गुणगान करने वाले गद्दारों को हूरों के पास भेजें.

इस हमले ने दिल को अंदर तक झकझोर दिया है, समझ नहीं आता कि इस कायराना तांडव के बाद कैसे मां भारती के वीरों की मिट्टी को समेटा गया होगा, कैसे उन्हें तिरंगे में लपेटा गया होगा और कैसे उनके घरवालों को संतोष हुआ होगा, जो बचपन से अपने सीने से लगाकर पाली थी वो मां कैसे अपने लाल की मिट्टी से लिपटी होगी क्योंकि जिस बस में विस्फोटक भरी कार टकरायी थी, सिर्फ उसमें ही एक ड्राइवर को लेकर चालीस जवान थे, धमाके के बाद उनके जिस्म के चीथड़े उड़ गये, न तो उन्हें संभलने का मौका मिला, न ही जवाबी कार्रवाई के लिए संभलने का वक्त, लेकिन भारत सरकार के पास जवाब देने के लिए मुकम्मल वक्त है और संसाधन भी.

इस हमले के वक्त हमने अपने आसपास गद्दारों की हंसी को महसूस किया, कहने के लिए मीडिया में सवर्णों का वर्चस्व है, मीडिया संस्थानों पर बनियो का कब्जा है, लेकिन ये दावे सफेद हाथी से कम कुछ भी नहीं है और बस खुश रहने के लिए ये ख्याल अच्छा है. जिस वक्त हमने खुद अपने कानों से जवानों के शहीद होने का एनाउंसमेंट सुना, क्रोध पर अचानक 42 डिग्री का देसी नशा चढ़ गया, दिल किया कि क्यों न नौकरी छोड़कर बागी बन जाऊं और चुन चुनकर इन गद्दारों को मौत के घाट उतार दूं, लाला लाजपत पाय, वीर सावरकर, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे नौजवानों ने बगावत नहीं की होती तो आज ये कमीने आजादी और अधिकार की बात नहीं कर रहे होते, बल्कि अंग्रेजों के बूट अपनी थूक से साफ कर रहे होते.

खासकर जो उच्च शिक्षित वर्ग है, उनकी सोच-समझ पर तरस आता हैं ये गद्दार इतना पढ़ लिखकर खुद को प्रबुद्ध मानते हैं और जिनके खून पसीने की कमाई से ये कमीने खुद को प्रबुद्ध बना पाते हैं, उन्हीं की पीठ में छुरा घोंपते हैं.  स्टूडियो में बैठे एंकर भी इस हमले में बराबर के दोषी हैं और जितना दोष सरकार का है, उतना ही दोष सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों का भी है जिन्होंने इंटेलिजेंस की चेतावनी को नजरअंदाज किया, जिसकी वजह से 40 जवानों को बिना दुश्मन का सीना छलनी किये ही मां भारती के रज में मिल जाना पड़ा क्योंकि पहली गलती तो उस वक्त हुई, जब खुफिया चेतावनी को वरिष्ठ अफसरों ने नजर अंदाज किया वो भी उस समय जब एक साथ सीआरपीएफ के 2547 जवान मूव कर रहे थे, इसे लापरवाही नहीं कहा जा सकता बल्कि, इसे सीधे-सीधे अधिकारियों द्वारा 40 जवानों को मौत के मुंह में धकेलना हुआ, जबकि जो जवान अभी अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं, उनमें से कितने दोबारा देश की रक्षा में तैनात रह पाते हैं, इस पर भी संदेह है.

Friday, 23 November 2018

वो जाते-जाते अपने साथ यहां का सावन-बसंत सब ले गयी

ऑफिस पहुंचने के बाद उसे कुछ भी याद नहीं रहता था, बस खबरें खोजना और उन्हें श्मशान में ले जाकर उनका अंतिम संस्कार करना उसका काम था. कई बार तो वह सोचता था कि यदि वह घाट का डोम होता और खबर रूपी लाशों का लेखाजोखा रखना होता तो न जानें कितने रजिस्टर भर चुका होता क्योंकि आठ साल से अधिक समय यही काम करते बीत चुका है. रोजाना की तरह उस दिन भी वह पूरे दिन ऑफिस में खबरों से टकराता और उलझता रहा, इस दौरान बार-बार मोबाइल पर प्रियदर्शनी का फोन आ रहा था, पर यह सोचकर वह फोन रिसीव नहीं किया कि बाद में बात कर लेगा, उधर से संदेश भी आया कि मोबाइल खराब हो गया है, नंबर नहीं है इसलिए मैसेंजर पर कॉल कर रही हूं, फिर भी खबरों के बीच वह इस कदर घिरा रहा कि न तो फोन पिक कर पाया और न ही वापस उसे फोन कर पाया, शाम को घर पहुंचा तो कपड़ा चेंज किया, फिर बिस्तर पर लेटकर ऊंघना शुरू किया, जी कर रहा था कि बस अब बिस्तर पर ही पूरी रात गुजार दे, पर ऐसा मुमकिन नहीं था क्योंकि खाना जो खुद से पकाना था, नहीं पकाने पर पूरी रात भूख से लड़ना पड़ता और नींद भी रूठकर चली जाती, नींद को मनाने के लिए आलस छोड़कर किचन में दाखिल होना था, इस बीच अचानक याद आया कि उसका संदेश आया था बात करनी है, चलो फोन लगाते हैं देखें क्या बात है।

अगले ही पल उसने उसको फोन किया और एक ही बार में फोन लग गया, जबकि अमूमन ऐसा कम ही होता है, पर फोन लगने के बाद नेटवर्क लुकाछिपी का खेल खेलने लगा, कोई भी बात पूरी न वहां पहुंचा रही थी और न ही यहां क्योंकि वह उस वक्त ट्रेन में सफर कर रही थी, सुबह से वह भी बेतरतीब तरीके से इधर-उधर भाग रही थी, इस वजह से बात करने का वक्त नहीं निकाल पायी और जब बात करना चाही तो जिससे करना था उसको समय नहीं था, हालांकि कुछ देर बाद बात शुरू हुई, थोड़ी हाल-चाल पूछने के बाद उसने कहा कि माफ करना अब मैं आपके शहर में नहीं रह पाऊंगी. वह कई बार इस बात का जिक्र पहले भी कर चुकी थी, पर आज उसकी बात सुनकर जैसे शरीर में ग्यारह हजार बोल्ट का करेंट लग गया था, वह बिल्कुल अवाक रह गया उसकी बात सुनकर क्योंकि उसने भी नये शहर में अपना ठिकाना ढूंढ़ लिया था, अब उसको इस शहर की जरूरत नहीं थी, बस आखिरी बार उस शहर में जाना था, वही खुशखबरी देने के लिए वह बार-बार फोन कर रही थी, हालांकि अपने फैसले पर वह बहुत खुश थी, उसके आनंद को शब्दों में बयां करना या सीमाओं में बांधना किसी कवि-साहित्यकार या कलाकार के बस में भी नहीं था।

उसकी हर बात को वह गंभीरता से सुन रहा था, पर कुछ भी जवाब नहीं दे रहा था, जो दिया भी तो हल्की सी हामी भर दी कि बस उसे पता चलता रहे कि वह उसकी बात सुन रहा है, लेकिन उसकी हर एक बात पर वह गम के समंदर में समाता जा रहा था क्योंकि उस शहर में उसके रहने की वजह वही थी, जब वह भी उस शहर से चली जाएगी तो वह किस के सहारे उस शहर में रहेगा, बस यही बात उसको परेशान कर रही थी और बीच-बीच में नेटवर्क भी दुश्मनी साध रहा था, उसका गला भर आया था, पर उसको आभास नहीं कराना चाहता था, इसलिए वह अपने आंसुओं को पीये जा रहा था, जब तक वह बात करता रहा, तब तक परेशानी कम रही, जैसे ही फोन कटा आंखों से आंसुओं की बरसात होने लगी, बिस्तर पर पड़े-पड़े मरीजों की तरह करवटें बदलता रहा और उसको याद करता रहा, वह उससे कहा कि वह आज पूरी रात उससे बात करे क्योंकि नींद तो अब उसे आनी नहीं थी और वह भी ट्रेन में सफर कर रही थी तो उसके पास भी पर्याप्त समय था।


वह बेड पर पड़े-पड़े पुराने खयालों में खोता चला गया, बीते एक साल का परिदृश्य उसकी आंखों के सामने चलचित्र की तरह चल रहा था क्योंकि पहली मुलाकात में ही उसने उसे बड़ी जोरदार फटकार लगाई थी, जिसके बाद वह कई दिनों तक उससे बात नहीं की थी, पर कहते हैं न कि बारिश के बाद धूप और तेज हो जाती है क्योंकि मौसम साफ हो जाता है और धूप को रास्ते में कोई रोकने वाला नहीं मिलता, ठीक वैसे ही उसके साथ हुआ, उस फटकार के बाद प्यार के जो अंकुर फूटे वो बारिश के बाद होने वाली धूप से भी तेज थे, समय के साथ वो अंकुर पेड़ की शक्ल में परिवर्तित होने लगे, पेड़ के तैयार होने का समय आ गया था, पर इस बीच आये आंधी के झोंके ने उसे ले जाकर दूसरे शहर में पटक दिया और वह अंकुर पेड़ तो बन गया पर छाया और फल किसी और शहर के हिस्से में चला गया, वह उन दिनों को याद करता रहा, पूरी रात बीत गयी, न उसे खाने की चिंता रही न नींद की, बस पूरी रात उन पलों को याद करते-करते गुजार दिया, इस बीच कई बार उसे फोन भी किया, पर कभी कुछ देर बात हो जाती तो कभी नेटवर्क साथ नहीं देता।


वह अलसाई सुबह उसको बार-बार याद आती है, जब वह बस से उतरकर पैदल चलता था और वह बार-बार उसको धीरे चलने के लिए टोकती थी, पर वह उसकी गति बढ़ाने के लिए हमेशा उससे आगे ही चलता और उसे तेज चलने के लिए प्रोत्साहित करता, सुबह के उस सुहाने मौसम का क्या कहूं, शांत वातावरण में चलती शीतल हवा मन को आनंदित कर देती थी, कभी-कभार सुनहरा आसमान और आस-पास जमीन पर घास की कलाकारियां और सड़क के किनारे खिलते लाल-सफेद फूल आंखों में नई चमक पैदा कर देती थी और जब उसका साथ होता तो क्या था, फिर तो न सावन की जरूरत पड़ती न बसंत का इंतजार रहता क्योंकि ऐसे मौसम में उसकी आंखों में बसंत दिखाई पड़ता तो पलकों के पीछे सावन के बादल, कंचन सी काया और पतली सुरीली आवाज कोयल और पपीहा को भी मुंह चिढ़ाती थी, उसके बदन से निकलती खुशबू चंदन से कम नहीं थी, जिसकी महक से वह फिजाओं को महकाती रहती थी, उसके आसपास का वातावरण हमेशा खुशमिजाज रहता था।

वह एक दिन भी उसे देखे बिना चैन से नहीं रहा पाता था, उसके बात करने का अंदाज और चेहरे पर 24 घंटे तैरती मुस्कान हर किसी को उसकी ओर खींच ले जाती थी, बस उसकी यही अदा पर वह फिदा हो गया था।


ये कहानी 21 अप्रैल 2017 को आये एक फोन कॉल पर आधारित है।

Sunday, 7 October 2018

आजादी के बाद ऐसे बदलती गई भारतीय चुनाव प्रक्रिया

भोपाल. भारत दुनिया का सबसे बड़ा और पुराना लोकतंत्र है. संविधान ने सांस्कृतिक विविधता से भरे इस देश को एक करने के लिए चार स्तंभ दिया है. कार्यपालिका, न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और चौथा पाया है मीडिया. विश्व का सबसे बड़ा लिखित, सबसे लचीला और सबसे कठोर संविधान रखने वाले हिन्दुस्तान के लोकतंत्र का आधार है यहां का जनतंत्र.

दरअसल, 2 साल 11 महीने और 18 दिन में बनकर तैयार हुआ भारत का संविधान इस देश के हर नागरिक को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देता है, यानि कि मतदान का अधिकार देता है. आजादी के बाद से भारत में चुनावों ने एक लंबा रास्ता तय किया है. आज तकनीक ने 120 करोड़ की जनसंख्या वाले देश को एक मशीन से जोड़ दिया है.

हम चुनावी माहौल देखते हैं, इलेक्शन के रंग देखते हैं, जीत का जश्न देखते हैं, हार का दुख देखते हैं. लेकिन, कभी सोचा है कि ये चुनाव होते कैसे हैं. भारत में चुनाव की प्रक्रिया क्या है, कौन कराता है ये चुनाव, कैसे होता है मतदान, मतगणना का आधार क्या है और ये नियम कायदे बनाए किसने हैं. ये है चुनाव प्रक्रिया के प्रमुख बिंदु.
  • भारत में मतदाताओं की विशाल संख्या को देखते हुए चुनाव कई चरणों में आयोजित किए जाते हैं. आम चुनाव अलग और विधानसभा चुनाव अलग-अलग होते हैं.
  • चुनावों की इस प्रक्रिया में चरणबद्ध तरीके से काम किया जाता है. इसमें भारतीय चुनाव आयोग द्वारा चुनावों की तिथि घोषित की जाती है. इससे राजनीतिक दलों के बीच 'आदर्श आचार संहिता' लागू होती है.
  • आचार संहिता लागू होने से लेकर परिणामों की घोषणा और सफल उम्मीदवारों की सूची राज्य या केंद्र के कार्यकारी प्रमुख को सौंपना शामिल होता है.
  • परिणामों की घोषणा के साथ चुनाव प्रक्रिया का समापन होता है और नई सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त होता है.

सबसे पहले ये कि चुनाव कराता कौन है?
भारत में चुनाव भारतीय संविधान के तहत बनाए गए भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा कराया जाता है. यह एक स्थापित परंपरा है कि एक बार चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद कोई भी अदालत चुनाव आयोग द्वारा परिणाम घोषित किये जाने तक किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकती है. चुनावों के दौरान, चुनाव आयोग को बड़ी मात्रा में अधिकार सौंप दिए जाते हैं और जरुरत पड़ने पर यह सिविल कोर्ट के रूप में भी कार्य कर सकता है.

विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया स्वरूप पर एक नजर
  • राज्य विधानसभा चुनावों के लिए कम से कम एक महीने का समय लगता है, जबकि आम चुनावों के लिए यह अवधि और बढ़ जाती है.
  • मतदाता सूची का प्रकाशन एक जरूरी चुनाव पूर्व प्रक्रिया है और यह भारत में चुनाव के संचालन के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. भारतीय संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो भारत का नागरिक है और जिसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक है, वह मतदाता सूची में एक मतदाता के रूप में शामिल होने के योग्य है, यह योग्य मतदाता की जिम्मेदारी है कि वह मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराए.
  • आमतौर पर, उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तिथि से एक सप्ताह पहले तक मतदाता पंजीकरण के लिए अनुमति दी गई है.

चुनाव के पहले क्या होता है?
  • चुनाव से पहले नामांकन, मतदान और गिनती की तिथियों की घोषणा की जाती है. चुनावों की तिथि की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है.
  • आदर्श आचार संहिता लगते ही किसी भी पार्टी को चुनाव प्रचार के लिए सरकारी संसाधनों को उपयोग करने की अनुमति नहीं होती है. आचार संहिता के नियमों के अनुसार मतदान के दिन से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार बंद कर दिया जाना चाहिए.
  • भारतीय राज्यों के लिए चुनाव से पहले की गतिविधियां अत्यंत आवश्यक होती हैं. आचार संहिता के अनुसार चुनाव प्रचार के लिए प्रत्याशी 10 चौपिहया वाहन ही रख सकता है, जबकि मतदान वाले दिन तीन चौपहिया वाहनों की अनुमति है.
  • प्रत्याशियों को अपनी संपत्ति संबंधित ब्योरा चुनाव आयोग को देना होता है.

मतदान के दिन
  • मतदान के दिन से एक दिन पहले चुनाव प्रचार समाप्त हो जाता है.
  • सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को मतदान केंद्रों के रूप में चुना जाता है. मतदान कराने की जिम्मेदारी प्रत्येक जिले के जिलाधिकारी की होती है. बहुत से सरकारी कर्मचारियों को मतदान केंद्रों पर लगाया जाता है.
  • चुनाव में धोखाधड़ी रोकने के लिए मतदान पेटियों की बजाय इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है और अब तो VVPAT से चुनाव होंगे.
  • मतदान के संकेत के रूप में मतदाता के बाईं तर्जनी अंगुली पर निशान लगाया जाता है.
  • इस कार्यप्रणाली का उपयोग 1962 के आम चुनाव के बाद से फर्जी मतदान रोकने के लिए किया जा रहा है.

चुनाव के बाद
  • चुनाव के दिन के बाद, ईवीएम को कड़ी सुरक्षा के बीच एक मजबूत कमरे में जमा किया जाता है. चुनाव के विभिन्न चरण पूरे होने के बाद वोटों की गिनती का दिन निर्धारित किया जाता है.
  • वैसे तो वोटों की गिनती के कुछ घंटों के भीतर विजेता का पता चल जाता है. लेकिन, सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को ही निर्वाचन क्षेत्र का विजेता घोषित किया जाता है.
  • सबसे अधिक सीटें प्राप्त करने वाले पार्टी या गठबंधन को राज्यपाल द्वारा नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है. किसी भी पार्टी या गठबंधन को सदन में वोटों का साधारण बहुमत (न्यूनतम 50%) प्राप्त करके विश्वास मत के दौरान सदन (लोक सभा-विधानसभा) में अपना बहुमत साबित करना आवश्यक होता है.
  • विधानसभा चुनाव का मूड, आम चुनाव से अलग कैसे?
  • आम चुनाव में बड़ी पार्टियां देश भर में चुनाव लड़ती हैं. अपने-अपने योद्धा मैदान में उतारकर. भारत में अब तक दो बड़े राष्ट्रीय दल हैं जो चुनाव भी लड़ते हैं और केंद्र में बाकी क्षेत्रीय दलों के साथ या फिर बहुमत लाने पर अकेले सरकार बनाते हैं. ये दल हैं इंडियन नेशनल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी. इनकी सरकारें यूपीए और एनडीए के नाम से जानी जाती हैं.
  • आमतौर पर विधानसभा चुनाव के राजा होते हैं क्षेत्रीय दल. राज्यों में इनका सिक्का ज्यादा चलता है. हालांकि, बात अगर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की करें तो यहां दो राज्यों में पिछली तीन सरकारें बीजेपी की रही हैं. राजस्थान में जरूर गणित 5-5 साल का रहा है.
  • विधानसभा चुनाव भारत के राज्यों में कराए जाने वाले राज्य-स्तरीय चुनाव होते हैं. इन चुनावों में हर राज्य की जनता अपने राज्य-स्तर के शासन के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है जिन्हें विधायक कहा जाता है. आम चुनावों से अलग इन चुनावों में चुने हुए विधायक राज्य-स्तर पर सरकार का गठन करते हैं.
  • इन चुनावों में भाग लेने वाले राजनीतिक दल वह भी हो सकते हैं जो आम चुनावों में भाग लेते हैं और इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों के अपने-अपने क्षेत्रीय दल भी हैं जो राज्य-विशेष में लोकप्रिय होते हैं. जैसे- पश्चिम बंगाल में टीएमसी, बिहार में JDU या RJD या फिर तमिलनाडु में आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम और उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को कैसे भूल सकते हैं. वैसे छत्तीसगढ़ में इस बार जोगी कांग्रेस दम झोंक रही है और बड़ी क्षेत्रीय पार्टी के रूप में उभरी है.
  • और हां, अगर अपना कार्यकाल पूरा करने से पूर्व कोई सरकार विधानसभा में बहुमत खो देती है तो यह चुनाव पांच वर्ष से पहले भी कराए जा सकते हैं और तब तक वहां राष्ट्रपति शासन लागू होता है, राज्यपाल देख-रेख करते हैं.

बीजेपी के लिए आसान नहीं कांग्रेस के इन किलों को भेदना, बार-बार खानी पड़ी है मात

भोपाल. मध्यप्रदेश का चुनावी दंगल इस बार कई मायनों में दिलचस्प रहने वाला है. जिस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं क्योंकि यहां न तो बीजेपी की राह आसान है और न कांग्रेस की. भले ही बीजेपी पिछले 15 सालों से सूबे की सत्ता पर काबिज है. लेकिन, कांग्रेस के कई किले ऐसे हैं, जिनके तिलिस्म को बीजेपी अब तक तोड़ नहीं पायी है.

पिछले तीन चुनावों से बीजेपी सियासी संग्राम में कांग्रेस के खिलाफ फतह हासिल की है. फिर भी कई किले ऐसे हैं, जहां चुनावी समर में बीजेपी के दिग्गजों को भी मुंह की खानी पड़ी है. उन विधानसभा सीटों की बात कर रहे हैं. जो कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में तब्दील हो चुकी है. जहां बीजेपी को लगातार मात खानी पड़ रही है. ऐसे में इस बार भी इन सीटों पर चुनावी मुकाबला जोरदार होगा.

चुरहट
सीधी जिले में आने वाली चुरहट विधानसभा सीट सूबे में कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है. बीजेपी हर चुनाव में यहां प्रत्याशी बदलती रही. लेकिन, उसे जीत मयस्सर नहीं हुई. यह विधानसभा सीट कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की पंरमपरागत सीट मानी जाती है. जहां से उनके पुत्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह विधायक हैं. अजय सिंह पिछले पांच चुनावों में यहां से लगातार जीत हासिल कर रहे है, जबकि इस बार भी बीजेपी के लिये यह सीट सबसे बड़ी चुनौती है.

राघोगढ़ 
गुना जिले की राघोगढ़ विधानसभा सीट कांग्रेस का अभेद्य किला माना जाता है. ऐसी सीट जिसका बीजेपी अब तक कोई तोड़ नहीं निकाल पायी है. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के परिवार का इस सीट पर दबदबा माना जाता है. 2003 के चुनाव में बीजेपी ने यहां अपने सबसे मजबूत नेता शिवराज सिंह चौहान को मैदान में उतारा था. लेकिन, दिग्गी राजा ने चुनावी दंगल में उन्हें भी धूल चटा दी थी. वर्तमान में इस सीट से दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह विधायक हैं. जिन्होंने पिछले चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी को 50 हजार वोटों से भी ज्यादा के अंतर से हराया था.

लहार
भिंड जिले की लहार विधानसभा सीट भी कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती है. इस सीट से कांग्रेस के दिग्गज नेता डॉक्टर गोविंद सिंह पिछले छः चुनावों से लगातार जीत हासिल करते आ रहे हैं. इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा माना जाता है. छः बार से शिकस्त झेल रही बीजेपी गोविंद सिंह के खिलाफ यहां से दमदार प्रत्याशी उतारने की कोशिश करेगी. ताकि इस किले को भेद सके. हालांकि, गोविंद सिंह पिछले लोकसभा चुनाव में मैदान में उतरे थे, पर उन्हें जीत मयस्सर नहीं हुई.

विजयपुर
ग्वालियर-चंबल अंचल के श्योपुर जिले में आने वाली विधानसभा सीट विजयपुर कांग्रेस का मजबूत गढ़ बनकर उभरी है. वर्तमान में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत यहां से पिछले पांच बार से चुनाव जीत रहे हैं. वे कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी माने जाते हैं. बीजेपी हर बार यहां पूरी ताकत से चुनाव लड़ी. लेकिन, उसे जीत हासिल नहीं हो पायी. हालांकि, इस बार इस सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है.

पिछोर
शिवपुरी जिले में आने वाली पिछोर विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी केपी सिंह 1993 से लगातार चुनाव जीत रहे हैं. पिछले चुनाव में भी उन्होंने बीजेपी के प्रत्याशी को करारी शिकस्त दी थी. ऐसे में इस बार भी इस विधानसभा सीट पर मुकाबला कांटे का होने वाला है क्योंकि केपी सिंह फिर जीत का दम भरते नजर आ रहे हैं.

भोपाल उत्तर
भोपाल जिले की भोपाल उत्तर विधानसभा सीट बीजेपी के लिये पिछले चार विधानसभा चुनाव से सिरदर्द बनी हुई है. यहां से कांग्रेस विधायक और सूबे में एकमात्र उम्मीदवार आरिफ अकील विधायक हैं. वे दिग्विजय सिंह सरकार में मंत्री रह चुके हैं और कांग्रेस में मुस्लिमों का सबसे मजबूत चेहरा माने जाते हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में यहां काटे की टक्कर देखने को मिली थी. इस बार भी यहां सियासी मुकाबला दोनों पार्टियों के लिये नाक का सवाल बना हुआ है. 

राजनगर
बुंदेलखंड अंचल के छतरपुर जिले की राजनगर सीट इस वक्त अंचल में कांग्रेस की सबसे मजबूत सीट मानी जाती है. पिछले तीन चुनावों में यहां से कांग्रेस प्रत्याशी विक्रम सिंह नातीराजा लगातार जीत दर्ज कर रहे हैं. पिछले चुनाव में उन्होंने बीजेपी के कद्दावर मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया को शिकस्त दी थी. इस सीट पर जीत हासिल करने की बीजेपी पूरी कोशिश करेगी.

राजपुर
बड़वानी जिले की राजपुर विधानसभा सीट भी कांग्रेस की मजबूत सीटों में गिनी जाती है. यहां से कांग्रेस विधायक बाला बच्चन भी प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. वे यहां से चार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं. हालांकि, 2003 में यह सीट बीजेपी जीतने में कामयाब हुई थी. लेकिन, दो बार से फिर उसे हार का सामना करना पड़ा रहा है. इस बार बीजेपी यहां मजबूत प्रत्याशी की तलाश में है. 

कसरावद
खरगोन जिले की कसरावद विधानसभा सीट कांग्रेस की मजबूत सीटों में मानी जाती है. इस सीट को कांग्रेस के कद्दावर नेता सुभाष यादव की पंरमपरागत सीट की नजर से देखा जाता है. हालांकि, इस सीट पर 2008 में बीजेपी को जीत मिली थी. लेकिन, 2013 में सुभाष यादव के पुत्र सचिन यादव ने यह सीट बीजेपी से फिर छीन ली थी. कांग्रेस इस सीट पर पांच चुनाव जीत चुकी है.

अमरपाटन
सतना जिले की अमरपाटन सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती है. इस सीट से विधायक राजेंद्र सिंह विधानसभा में उपाध्यक्ष हैं. हालांकि, इस सीट पर भी एक बार बीजेपी जीतने में कामयाब हुई है. लेकिन, पिछले चुनावों में बड़ी जीत हासिल कर राजेंद्र सिंह ने एक बार फिर यहां कांग्रेस का झंडा बुलंद किया, जबकि इस बार भी इस सीट पर मुकाबला कड़ा होने की उम्मीद है.

यहां चुनावी मुकाबला रोचक होने की उम्मीद 
सूबे में होने वाले सियासी समर में बीजेपी इस बार कांग्रेस के इन मजबूत गढ़ों में सेंधमारी की पूरी कोशिश करेगी. भले ही बीजेपी 15 साल से सत्ता पर काबिज है. लेकिन, चुनावी समर में ये सीटें जीतना किसी चुनौती से कम नहीं है. ऐसे में इस बार भी बीजेपी इन सीटों पर पूरा जोर लगाती नजर आयेगी. जिससे यहां का चुनावी मुकाबला रोचक होने की उम्मीद है.

बीजेपी-कांग्रेस के बीच विलेन बना तीसरा मोर्चा, बिगाड़ सकता है सियासी गणित

भोपाल. मध्यप्रदेश में औपचारिक रुप से चुनावी बिगुल बज चुका है. ऐसे में नए-नए सियासी समीकरण बनने बिगड़ने शुरु हो गये हैं. सूबे की सभी 230 विधानसभा सीटों पर इस बार जोरदार मुकाबला होने की उम्मीद है क्योंकि पिछले तीन चुनावों की अपेक्षा सूबे में इस बार कुछ ऐसे समीकरण बने हैं. जिसने प्रमुख दलों की नीद उड़ा दी है, जिसके एक कदम आगे बढ़ने से कोई भी कई कदम पीछे खिसक सकता है, जबकि कोई कई कदम आगे निकल सकता है.

सूबे में सतारूढ़ बीजेपी जहां सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने जा रही है तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी सिसायी वनवास खत्म करने की जद्दोजहद में लगी है. लेकिन, इन सब के बीच मध्यप्रदेश में पहली बार तीसरा मोर्चा पूरी ताकत के साथ दमखम दिखाता नजर आ रहा है. जो बीजेपी और कांग्रेस दोनों के अरमानों पर पानी फेर सकता है.



इससे बीजेपी-कांग्रेस दोनों की मुश्किलें बढ़ जायेंगी
दरअसल, बसपा-सपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, आमआदमी पार्टी, सपाक्स, जयआदिवासी युवा संगठन के साथ अन्य कई छोटे-छोटे दल पूरी ताकत के साथ चुनावी समर में ताल ठोक रहे हैं. जिनका राज्य के कुछ-कुछ हिस्सों में मजबूत पकड़ है. वहीं, मतदान से पहले इन सभी दलों के बीच महागठबंधन होने के कयास भी लगाये जा रहे है, जबकि अगर ऐसा होता है तो इससे बीजेपी-कांग्रेस दोनों की मुश्किलें बढ़ जायेंगी.

अहम भूमिका में नजर आ सकता है तीसरा मोर्चा
प्रदेश में होने जा रहे सियासी दंगल में इस बार तीसरे मोर्चे की खास भूमिका होगी क्योंकि छः अंचलों में बटी सूबे की सियासत में हर छोटे-बड़े राजनीतिक दलों का अपना-अपना सियासी रसूख है, जो दिखाई भी देता है. पूरे महाकौशल अंचल में गोंगपा और बसपा का अच्छा खासा दबदबा माना जाता है तो इस बार जयस जैसे संगठन का दम भी कम नहीं है. वहीं, बात अगर बुंदेलखंड और विंध्य अंचल की हो तो इन दोनों ही जोन में बसपा और सपा मजबूत नजर आती है, जबकि ग्वालियर-चंबल अंचल में यूपी से सटी विधानसभा सीटों पर भी इन दोनों पार्टियों का अच्छा खासा प्रभाव है. बात अगर मालवा-निमाड़ और मध्यभारत की की जाये तो इस बार तीसरे मोर्चे की धमक इन दोनों अंचलों में भी जोर-शोर से सुनाई दे रही है. जिसने अभी से बीजेपी-कांग्रेस की परेशानियां बढ़ा दी है.

ऐसी होगी सूबे में तीसरे मोर्चे की तस्वीर
बात अगर तीसरे मोर्चे के स्वरुप की की जाये तो इसमें छोटी-बड़ी कई पार्टियां नजर आ सकती हैं. तीसरे मोर्चे में सबसे बड़ा रोल बसपा और सपा का होने वाला है क्योंकि यूपी के इन दोनों सियासी दलों की नजरें अब मध्यप्रदेश पर टिकी हैं, जबकि कई छोटी-छोटी पार्टियां जिनमें भारतीय शक्ति चेतना पार्टी, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी, महान दल, राष्ट्रीय समानता दल, बहुजन संर्घष दल जैसी पार्टियां भी चुनावी समर में उतरेंगी. वहीं, चर्चा तो इस बात की भी है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव की अगुवाई में इन सभी पार्टियों के बीच महागठबंधन भी हो सकता है. अगर ये महागठबंधन बनता है तो इसमें सपा-बसपा के भी साथ आने की उम्मीद जताई जा रही है. जोकि तीसरे मोर्चे को मजबूती प्रदान करेगी.

ये नया समीकरण बिगाड़ सकता है कांग्रेस-बीजेपी का खेल
इन पार्टियों में ऐसे सियासी सूरमा हैं, जिनकी अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छी पकड़ है. ऐसे नेताओं में गोंगपा के हीरा सिंह मरकाम, सपा के प्रदेश अध्यक्ष गौरी सिंह यादव, बहुजन संघर्ष दल के फूल सिंह बरैया जैसे नेता अहम साबित हो सकते हैं. वहीं, इन सब के बीच आम आदमी पार्टी, सपाक्स पार्टी ने गठबंधन जैसी कोई बात तो नहीं की है. लेकिन, इन पार्टियों की तैयारियां मैदान में दम दिखाने की पूरी हैं. आप ने तो प्रदेश संयोजक आलोक अग्रवाल को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतार दिया है और उम्मीदवारों की दो सूची भी जारी कर चुकी है. वहीं सपाक्स और जयस भी पूरी तरह से चुनावी तैयारियों में जुटे हैं. ऐसे में तीसरे मोर्चे का बनता सियासी समीकरण बीजेपी-कांग्रेस के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ने में बड़ा रोल निभा सकती है, जबकि इतना तो तय है कि इस बार प्रदेश की सभी सीटों पर बीजेपी-कांग्रेस के साथ तीसरा प्रत्याशी भी मजबूत दिखाई दे सकता है.