किसानों की पूंजी उनकी जमीन होती है उनसे उनकी पूंजी ही छीन ली जाए तो उन्हे भुखमरी के दरवाजे पर खड़े होने में
ज्यादा वक्त नही लगता। हालांकि कई प्रदेशों की सरकारे अपनी मनमर्जी से जब चाहे
किसानों की जमीन हड़प लेती हैं। जिसकी खिलाफत लाचार और मजबूर किसान नही कर पाते।
लेकिन कटनी के किसानों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अन्न जल
त्याग कर कलेक्ट्रेट के सामने सत्याग्रह शुरू कर दिया है। साथ ही चेतावनी भी दी कि
मौत कुबूल है। लेकिन बिना जमीन के जिंदगी नही मंजूर हैं। बरही में लग रहे वेलेस्पन
प्लांट के विरोध में बुजबुजा और डोकरिया के किसान सत्याग्रह करने को मजबूर हैं।
सत्ता के नशे में चूर शिवराज सरकार निजी फायदे के लिए बेसहारा किसानों की जमीन
जबरन अधिग्रहण कर कंपनियों को बेचकर मोटा मुनाफा कमा रही है। किसान भूख से तड़प
तड़प कर आत्महत्या करने को मजबूर हैं। पहले भी कई किसान हक की लड़ाई में अपनी जान
गवां चुके हैं। और अब उस लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उनकी पत्नियां अपनी जान देने
पर उतारू हैं। एक हफ्ते बाद भी किसानों की सुध लेने कोई रहनुमा नही पहुंचा।
हालांकि उनका प्राथमिक उपचार कराया जा रहा है। लेकिन उनके दिलों के जख्म को ये
डॉक्टर कैसे भरेंगे जो सरकार ने दिया है। खेती को लाभ का सौदा बताने और किसानों की
मसीहा बताने वाली शिवराज सरकार के हाथ किसानों के खून से लथपथ है। हत्यारी सरकार
के सामने बेबस किसानों के पास कोई रास्ता नही है। कि आखिर वो जाएं भी तो कहां...?
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Thursday, 5 September 2013
Friday, 30 August 2013
लोकतंत्र की ताकत
राजस्थान विधान
सभा ने जिस तरह का ऐतिहासिक फैसला लिया है। उसे कहीं ना कहीं लोकतंत्र की जीत के
रूप में देखा जा सकता है। जो हमारे रहनुमाओं का स्वागत योग्य कदम है। लेकिन दूसरों के लिए कानून बनाने वाले वही रहनुमा अपनी
बारी आने पर उस तरह की शख्ती नही दिखाते हैं। तो क्या ये मान लिया जाए कि जनप्रतिनिधियों
की हुकूमत ही चलेगी। या उन्हे भी किसी कायदे कानून से गुजरने की जरूरत
है। विषेषाधिकार समिति की अवमानना की दोषी गांधी नगर थाना प्रभारी रत्ना गुप्ता को एक माह कठोर कारावास की सजा सुनाई है। जिसे राजस्थान विधानसभा के इतिहास का इकलौता और पहला मामला माना जा रहा है। लेकिन
वहां मौजूद अवमानना के हनन पर अपनी सहमति देने वाले हमारे कितने रहनुमा अपने दामन
को बचाने में कामयाब रहें है। ये तो वही हाल है कि दूसरों को नसीहत और खुद मियां
फजीहत। दरअसल 19 जुलाई 2010 को
विधानसभा की महिला एंव बाल कल्याण समिति अध्यक्ष सुर्यकान्ता व्यास गांधी नगर थाने
का औचक निरीक्षण करने पहुंची। तो रत्ना ने उन्हे कोई जानकारी नही दी। जिसकी शिकायत विधानसभा विषेषाधिकार समिति से की गई। समिति के समन के बाद गुप्ता
ने कोर्ट में चुनौती देने का रास्ता चुना। जो हमारे रहनुमा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। विधानसभा में पहली बार जैसी सख्ती दिखाते हुए अधिकारों का प्रयोग किया गया। ऐसे ही फैसले यदि दागी और दबंग रहनुमाओं पर लिया जाता। या खुद के लिए भी बनाया जाता। तो उसे बेहतर परिणाम के रूप में देखा जाता। लेकिन ऐसी कार्रवाई से किसी तरह के बदलाव के बजाय टकराव की आहट मिलती है। यानि रहेंगे वही ढाक के तीन पात ।
आतंक पर सियासत
600 लोगों को मौत की नींद सुलाने वाले इंडियन मुजाहिद्दीन के सह संस्थापक यासिन भटकल पर शिकंजा कसते ही हमारे रहनुमा
राजनीतिक रंग देने में जुट गए। सपा नेता कमाल
फारुकी ने पूछा कि भटकल की गिरफ्तारी गुनाह के आधार पर हुई है या धर्म के आधार पर...लेकिन
जब मौत का खूनी खेल खेला जाता है उस समय उनकी जुबान पर ताला क्यों लग जाता है। कमाल
साहब आपकी तो सरकार है और आपकी सरकार भी उसी धर्म की वकालत करती है जिस धर्म से आप
आते है अच्छा होता कि आप आरोप लगाने के बजाय सरकार से उसे समाजसेवी होने का
प्रमाणपत्र दिला देते। जबकि सुशील मोदी ने “इशरत जहां को बेटी बताने वाली जेडीयू यासीन भटकल को बिहार का दामाद
भी घोषित कर सकती है” अंततः ये बात समझ में नही आती कि आखिर हर मुद्दे हर
सवाल हर आरोप को हमारे रहनुमा धर्म जाति का रंग दे देते हैं। जो आने वाले समय में भयानक तस्वीर बनाता दिखाई दे रहा है
Wednesday, 28 August 2013
रसातल चला रूपया 28 august 2013
देश
में उल्टी चाल चल रहा रुपया ऐसे रसातल में पहुंच रहा है। जहां से वापसी की संभावना
नजर नही आती। 11 जून से रूपया लुढ़कता 69 के समीप जा पहुंचा। जिसे रोकने में रिजर्व
बैंक और सरकार खुद को असहज महसूस कर रही है। रूपया हर दिन नए कीर्तिमान बना रहा है।
आप सोच रहे हैं कि रूपए की गिरती कीमत
और अर्थव्यवस्था के संकट से अपने को क्या लेनदा-देना। तो आप गलत
सोच रहे हैं। आयात होने वाला सामान मंहगा होगा। सरकार द्वारा लिए गए कर्ज पर
ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा। इन सबसे विदेशी मुद्रा का
भण्डार खाली होता जाएगा। जबकि इसका बोझ आम जनता पर ही पड़ेगा। किसी देश की मुद्रा जब
कमज़ोर होती है। तो इसका अर्थ है कि उस देश की सरकार का उसकी अर्थव्यवस्था पर
नियंत्रण कमज़ोर हो रहा है। उसकी निर्भरता बाहरी
अर्थव्यवस्था और अनिश्चित बाज़ार पर बढ़ रही है। रूपए की कीमत
डालर के मुकाबले इतनी कमजोर क्यों हो रही है। ये चिंता इस समय हर हिंदुस्तानी को
सता रही है। कि आखिर अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के राज में इतना बड़ा अनर्थ कैसे
हो रहा है। लेकिन सरकार को अर्थव्यवस्था से ज्यादा फूड सिक्योरिटी बिल पास कराने
की चिंता सता रही थी। जिसे सरकार ने लोकसभा में पास भी करवा लिया है। सरकारी
खजाने पर खाद्य सुरक्षा बिल के चलते पड़ने वाले लाखों करोड़ की सब्सिडी के बोझ के
चलते भारत की आर्थिक हालत बद से बदतर होने की आशंका से इनकार नही किया जा सकता। जिसके
परिणाम स्वरूप रूपए की हालत पतली होती जा रही है। दरअसल विदेश व्यापार नीति के मुताबिक आयात
निर्यात बराबर मात्रा में किया जाना चाहिए । लेकिन मौजूदा समय में 7.02 बिलियन डॉलर
निर्यात किया जा रहा है। जबकि विदेशी सामग्री का आयात 12.3 बिलियन डॉलर हो रहा है।
यानि लगभग पचास फीसदी निर्यात कम हो रहा है। पचास फीसदी डॉलर के बदले अधिक रूपया
चुकाना पड़ रहा है। जिसके लिए सिर्फ हमारी सरकार जिम्मेदार है। विश्व व्यापार
संगठन में जिस तरह लापरवाही (आयात चरम पर निर्यात शून्य) बरती गई है। उससे
हिंदुस्तान को अमेरिका का मोहताज होना पड़ रहा है। हाल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
के सरकार के फैसले के चलते भी रूपया रसातल में जा रहा है। क्योंकि सरकार का ध्यान आयात
पर ही केंद्रित रहा। जबकि निर्यात के बारे में सरकार ने जरा भी नही सोचा। यानि
रूपए के सुधरने की भविष्य में कोई संभावना नजर नही आ रही है। जिस पर राजनीतिक
पार्टियों ने भी गहरी चिंता जताई है। रूपया कोमा में पहुंच चुका है देश की
अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। जनता को मंहगाई का डर सताने लगा है। लेकिन रूपए
की सेहत बनाने में सरकार खुद को लाचार महसूस कर रही है। सरकार संसद में जिस तरह से
फूड सिक्योरिटी बिल को लेकर गंभीर नजर आई। वैसे ही यदि रूपए की सेहत पर गंभीरता
दिखाती तो रूपए को इतना शर्मिंदा नही होना पड़ता। लेकिन वित्तीय घाटा कम करने के
लिए सरकार की तरफ से अभी तक कोई ठोस पहल नही की गई है। जो इसकी आर्थिक असफल
नीतियों को दर्शाती है।
Wednesday, 21 November 2012
क्या कोयला घोटाले की निष्पक्ष जांच संभव है?
क्या कोयला घोटाले की निष्पक्ष जांच संभव है?
यूपीए 2 सिर से पांव तक भ्रष्टाचार में
डूबी हुई है।इसके मंत्री तो मंत्री स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी भ्रष्टाचार
की कालिख से बच नहीं पाए। हाल ही में कैग द्वारा किए गए कोल ब्लॉक
आवंटन घोटाले के खुलासे में कोयले की कालिख प्रधानमंत्री पर भी लगी है। विपक्ष ने
मौका देख पीएम के इस्तीफे की पेशकश कर डाली। पूरा संसद का मानसून सत्र कोयले की
कालिख में स्वाहा हो गया। लेकिन इसके बाद भी देश का प्रधानमंत्री मोम का पुतला
बनकर तमाशा देखता रहा। औऱ विरोध की आग में जनता की गाढ़ी कमाई जलती रही। जिसका जश्न सभी
कांग्रेसी और उसके सहयोगी दल मिलकर मनाते रहे। विपक्ष के हंगामे से बचने और खुद को
बेदाग दिखाने के चक्कर में प्रधानमंत्री ने कैग जैसी संस्था पर ही सवाल खड़े कर
दिए। तो जो इंसान कैग जैसी संस्था पर सवाल उठा सकता है, और उसी के अधीन रहने वाली
देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई कैसे उसके खिलाफ जांच करेगी। लिहाजा जब तक
प्रधानमंत्री अपने पद पर विराजमान रहेंगे तब तक कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले की
निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती और न ही कोयले के दाग किसी “आधार” की वजह से धुल सकते
हैं। हालांकि विपक्ष के लगातार हो रहे हमले की वजह से सीबीआइ ने प्रारंभिक जांच का
केस तो दर्ज कर लिया है जोकि कोयला ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी के बजाय आवंटित ब्लॉकों के दुरुपयोग पर केंद्रित
है ।जिससे प्रधानमंत्री जांच के दायरे से
बाहर हो जाएंगे जबकि इसमें प्रधानमंत्री की
भूमिका की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत है। लेकिन सीबीआई भी जांच के नाम पर
सिर्फ मजाक कर रही है। आवंटन से जुड़े तत्कालीन कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और
मंत्रालय के तमाम वरिष्ठ अधिकारियों सहित
उस समय कोयला मंत्रालय का प्रभार संभालने वाले खुद प्रधानमंत्री भी जांच के दायरे में होंगे।लेकिन सीबीआई
जिस तरह की जांच कर रही है उससे आवंटित
कोयला ब्लाकों के दुरुपयोग की जांच केवल
संबंधित कंपनियों तक सीमित होकर रह जाएगी। जाहिर है कि आवंटित कोयला ब्लाकों तक जांच सीमित कर सीबीआइ बड़े
लोगों को घोटाले के आरोपों से बचाने का
रास्ता बनाने की जुगत में है औऱ साथ ही जो दाग प्रधानमंत्री के दामन पर लगे हैं
उसकी सफाई में अपनी निष्पक्षता को ही कटघरे में खड़ी कर रही है ।लिहाजा यहां पर ये
कहावत चरितार्थ होती है कि सैयां भए कोतवाल तो डर काहें का । क्योंकि कानून मंत्री भी अपना
है ।सीबीआई भी अपनी है । और अगर कोर्ट कचहरी से निकलकर मामला बाहर भी जाए तो
महामहिम राष्ट्रपति भी अपने ही हैं ।
कोयला घोटाले की निष्पक्ष जांच संभव है...?
कोयला घोटाले की निष्पक्ष जांच संभव है?
यूपीए 2 सिर से पांव तक भ्रष्टाचार में
डूबी हुई है।इसके मंत्री तो मंत्री स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी भ्रष्टाचार
की कालिख से बच नहीं पाए। हाल ही में कैग द्वारा किए गए कोल ब्लॉक
आवंटन घोटाले के खुलासे में कोयले की कालिख प्रधानमंत्री पर भी लगी है। विपक्ष ने
मौका देख पीएम के इस्तीफे की पेशकश कर डाली। पूरा संसद का मानसून सत्र कोयले की
कालिख में स्वाहा हो गया। लेकिन इसके बाद भी देश का प्रधानमंत्री मोम का पुतला
बनकर तमाशा देखता रहा। औऱ विरोध की आग में जनता की गाढ़ी कमाई जलती रही। जिसका जश्न सभी
कांग्रेसी और उसके सहयोगी दल मिलकर मनाते रहे। विपक्ष के हंगामे से बचने और खुद को
बेदाग दिखाने के चक्कर में प्रधानमंत्री ने कैग जैसी संस्था पर ही सवाल खड़े कर
दिए। तो जो इंसान कैग जैसी संस्था पर सवाल उठा सकता है, और उसी के अधीन रहने वाली
देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई कैसे उसके खिलाफ जांच करेगी। लिहाजा जब तक
प्रधानमंत्री अपने पद पर विराजमान रहेंगे तब तक कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले की
निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती और न ही कोयले के दाग किसी “आधार” की वजह से धुल सकते
हैं। हालांकि विपक्ष के लगातार हो रहे हमले की वजह से सीबीआइ ने प्रारंभिक जांच का
केस तो दर्ज कर लिया है जोकि कोयला ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी के बजाय आवंटित ब्लॉकों के दुरुपयोग पर केंद्रित
है ।जिससे प्रधानमंत्री जांच के दायरे से
बाहर हो जाएंगे जबकि इसमें प्रधानमंत्री की
भूमिका की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत है। लेकिन सीबीआई भी जांच के नाम पर
सिर्फ मजाक कर रही है। आवंटन से जुड़े तत्कालीन कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और
मंत्रालय के तमाम वरिष्ठ अधिकारियों सहित
उस समय कोयला मंत्रालय का प्रभार संभालने वाले खुद प्रधानमंत्री भी जांच के दायरे में होंगे।लेकिन सीबीआई
जिस तरह की जांच कर रही है उससे आवंटित
कोयला ब्लाकों के दुरुपयोग की जांच केवल
संबंधित कंपनियों तक सीमित होकर रह जाएगी। जाहिर है कि आवंटित कोयला ब्लाकों तक जांच सीमित कर सीबीआइ बड़े
लोगों को घोटाले के आरोपों से बचाने का
रास्ता बनाने की जुगत में है औऱ साथ ही जो दाग प्रधानमंत्री के दामन पर लगे हैं
उसकी सफाई में अपनी निष्पक्षता को ही कटघरे में खड़ी कर रही है ।लिहाजा यहां पर ये
कहावत चरितार्थ होती है कि सैयां भए कोतवाल तो डर काहें का । क्योंकि कानून मंत्री भी अपना
है ।सीबीआई भी अपनी है । और अगर कोर्ट कचहरी से निकलकर मामला बाहर भी जाए तो
महामहिम राष्ट्रपति भी अपने ही हैं ।
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